लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राजनीति में कभी सबसे मजबूत ताकत रही कांग्रेस अब राज्य में अपनी खोई जमीन वापस पाने की कोशिश कर रही है। विधानसभा चुनाव में कुछ महीने बाकी हैं, लेकिन विपक्षी गठबंधन की तस्वीर अभी पूरी तरह साफ नहीं हो पाई है। समाजवादी पार्टी के साथ सीट बंटवारे को लेकर भी कांग्रेस की स्थिति स्पष्ट नहीं है। कभी ब्राह्मण, मुस्लिम और अनुसूचित जाति वोट बैंक के सहारे सत्ता में रहने वाली कांग्रेस पिछले तीन दशकों में लगातार कमजोर होती चली गई।
1989 के बाद यूपी में खत्म हुआ कांग्रेस का दबदबा
दिसंबर 1989 में जनता दल की जीत के बाद मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने और इसके साथ ही राज्य में कांग्रेस के लंबे शासन का दौर खत्म हो गया। इसके बाद विधानसभा और लोकसभा चुनावों में कांग्रेस का वोट शेयर लगातार गिरता गया। 1991 से 2024 तक पार्टी को कई राजनीतिक झटके लगे।
कमजोर संगठन, नेताओं और कार्यकर्ताओं का पार्टी से दूर होना और लगातार नेतृत्व परिवर्तन जैसे कारणों से कांग्रेस उत्तर प्रदेश में एक सीमित राजनीतिक ताकत बनकर रह गई।
कभी 400 से ज्यादा सीटों पर लड़ने वाली कांग्रेस अब सिमटी
1991 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 425 में से 413 सीटों पर चुनाव लड़ा था और 46 सीटें जीतने में सफल रही थी। उस चुनाव में पार्टी को 17.32 प्रतिशत वोट मिले थे।
1993 में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन के बाद कांग्रेस का वोट प्रतिशत घटकर 15.08 प्रतिशत रह गया और पार्टी सिर्फ 28 सीटों पर सिमट गई।
1996 में पीवी नरसिम्हा राव के नेतृत्व में कांग्रेस ने बसपा के साथ गठबंधन किया। पार्टी ने 126 सीटों पर चुनाव लड़ा और 33 सीटें जीतीं, लेकिन वोट प्रतिशत घटकर 8.35 प्रतिशत रह गया।
इसके बाद सोनिया गांधी के नेतृत्व में भी पार्टी की स्थिति में बड़ा सुधार नहीं हो सका। 2002 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 25 सीटें मिलीं, 2007 में 22 सीटें और 2012 में 28 सीटों पर जीत हासिल हुई।
सपा के साथ गठबंधन भी नहीं बदल पाया कांग्रेस की स्थिति
2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन किया था। उस समय अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। चुनाव से पहले सीटों का समझौता हुआ, जिसमें सपा को 403 में से 298 सीटें और कांग्रेस को 105 सीटें मिलीं।
हालांकि, दोनों दलों का यह गठबंधन चुनाव में अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर सका। कांग्रेस ने कुल 114 सीटों पर चुनाव लड़ा और 6.25 प्रतिशत वोट के साथ केवल सात सीटें जीत पाई। वहीं समाजवादी पार्टी को 47 सीटों पर जीत मिली।
2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने अकेले चुनाव लड़ा। पार्टी ने 399 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, लेकिन 2.33 प्रतिशत वोट के साथ सिर्फ दो सीटें जीत सकी।
कांग्रेस का पुराना वोट बैंक क्षेत्रीय दलों में बंटा
कांग्रेस कभी उत्तर प्रदेश को अपना मजबूत गढ़ मानती थी। 1985 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए विधानसभा चुनाव में पार्टी ने 269 सीटों पर जीत हासिल की थी। लेकिन 1989 में यह संख्या घटकर 94 रह गई और इसके बाद कांग्रेस दोबारा राज्य में सरकार नहीं बना सकी।
राज्य की राजनीति में मंडल आंदोलन, राम जन्मभूमि आंदोलन और समाजवादी पार्टी व बहुजन समाज पार्टी जैसे क्षेत्रीय दलों के उभार ने कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक को प्रभावित किया।
दलित वोटों का बड़ा हिस्सा बसपा के साथ चला गया, जबकि मुस्लिम मतदाता धीरे-धीरे समाजवादी पार्टी के साथ जुड़ते गए। इससे कांग्रेस का सामाजिक आधार लगातार कमजोर होता गया।
सवर्ण वोट बैंक खिसकने से भी लगा बड़ा झटका
कांग्रेस के कमजोर होने के साथ ही उत्तर प्रदेश में सवर्ण मतदाताओं का बड़ा हिस्सा भाजपा की ओर चला गया। वहीं समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने भी अपने सामाजिक समीकरण को मजबूत किया।
कांग्रेस अपने पुराने जनाधार को वापस हासिल करने में सफल नहीं हो पाई। 1990 के दशक में जहां पार्टी का वोट प्रतिशत कई बार 15 से 18 प्रतिशत के बीच रहा, वहीं बाद के चुनावों में यह घटकर 10 प्रतिशत और कई बार 5 प्रतिशत से भी नीचे पहुंच गया।
