CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग पर जंतर-मंतर 2.0 का ऐलान, क्या प्रदर्शन से हटाए जा सकते हैं मुख्य चुनाव आयुक्त? जानें पूरी प्रक्रिया

नई दिल्ली: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक और संयोजक अभिजीत दीपके ने 10 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन का ऐलान किया है। उन्होंने लोगों से इस प्रदर्शन में शामिल होने की अपील की है। पार्टी ने इसे जंतर-मंतर 2.0 नाम दिया है। हालांकि, मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की प्रक्रिया किसी केंद्रीय मंत्री से बिल्कुल अलग होती है।

पिछली बार नीट पेपर लीक के मुद्दे पर जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शनों का हवाला देते हुए सीजेपी ने इस बार मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग उठाई है। पार्टी की ओर से यह भी कहा गया है कि अगर पुलिस की ओर से कार्रवाई की गई तो गृह मंत्री अमित शाह के इस्तीफे की मांग भी की जाएगी।

मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाना नहीं है आसान

किसी केंद्रीय मंत्री के इस्तीफे की प्रक्रिया और मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया में बड़ा अंतर है। प्रधानमंत्री की सलाह या मंत्रिमंडल के स्तर पर केंद्रीय मंत्री इस्तीफा दे सकते हैं। इसके विपरीत मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने के लिए संविधान में विशेष प्रक्रिया तय की गई है।

संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को उसी तरीके से हटाया जा सकता है, जिस तरीके से सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को पद से हटाया जाता है। इसके लिए संसद में महाभियोग जैसी प्रक्रिया पूरी करनी होती है।

कैसे शुरू होती है मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया?

मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए संसद के किसी एक सदन में प्रस्ताव का नोटिस दिया जाता है। लोकसभा में इसके लिए कम से कम 100 सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी होते हैं, जबकि राज्यसभा में कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर होने चाहिए।

नोटिस मिलने के बाद लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति के पास उसे स्वीकार या अस्वीकार करने का अधिकार होता है। अगर प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया जाता है तो प्रक्रिया वहीं समाप्त हो जाती है। खबर में बताया गया है कि ज्ञानेश कुमार के खिलाफ ऐसा नोटिस पहले भी दिया जा चुका है, जिसे लोकसभा अध्यक्ष ने स्वीकार नहीं किया था।

प्रस्ताव स्वीकार होने के बाद जांच समिति करती है जांच

अगर प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाता है तो आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया जाता है। इस समिति में सुप्रीम कोर्ट के एक न्यायाधीश, किसी हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और कानून के जानकार व्यक्ति को शामिल किया जाता है।

समिति आरोपों और उनसे जुड़े सबूतों की जांच करती है। जिस व्यक्ति के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू की गई है, उसे अपना पक्ष रखने का मौका भी दिया जाता है।

अगर समिति को आरोप सही नहीं लगते हैं तो प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ती। वहीं, अगर समिति आरोपों को सही पाती है तो इसके बाद दोनों सदनों में प्रस्ताव पर मतदान कराया जाता है।

दोनों सदनों में विशेष बहुमत होना जरूरी

मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने के लिए संसद के दोनों सदनों में प्रस्ताव का पारित होना जरूरी है। इसके लिए सदन में मौजूद और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत के साथ-साथ सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत भी जरूरी होता है।

दोनों सदनों से प्रस्ताव पारित होने के बाद इसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है। राष्ट्रपति के आदेश के बाद ही मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की प्रक्रिया पूरी होती है।

ज्ञानेश कुमार और धर्मेंद्र प्रधान का मामला अलग क्यों है?

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के पद की संवैधानिक स्थिति अलग है। केंद्रीय मंत्री प्रधानमंत्री की सलाह पर इस्तीफा दे सकते हैं, जबकि मुख्य चुनाव आयुक्त को सरकार की ओर से इसी तरह इस्तीफा देने के लिए निर्देशित नहीं किया जा सकता।

चुनाव आयोग एक स्वायत्त संवैधानिक संस्था है। मुख्य चुनाव आयुक्त अपनी इच्छा से इस्तीफा दे सकते हैं, लेकिन उन्हें हटाने के लिए संविधान में तय प्रक्रिया का पालन करना जरूरी है।

CEC को आधिकारिक कामकाज को लेकर मिली है सुरक्षा

मुख्य चुनाव आयुक्त के पद पर रहते हुए उनके आधिकारिक कामकाज को लेकर भी कानूनी सुरक्षा का प्रावधान है। 2023 के मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम की धारा 16 के तहत उन्हें आधिकारिक कार्यों को लेकर सुरक्षा प्रदान की गई है।

खबर में दिए गए आंकड़ों के मुताबिक लोकसभा में एनडीए के पास 318, इंडिया गठबंधन के पास 184 और अन्य दलों के पास 38 सांसद बताए गए हैं। राज्यसभा में एनडीए के 147 और इंडिया गठबंधन के 67 सांसद बताए गए हैं, जबकि अन्य दलों के सांसदों को मिलाकर यह संख्या 96 बताई गई है।

Related posts