आज की 300 करोड़ वाली चमकदार फिल्मों के दौर में 1958 की एक ब्लैक-एंड-व्हाइट फिल्म अब भी कई निर्देशकों की नींद उड़ा सकती है। जिस कहानी को आज लोग “नया कॉन्सेप्ट” कहकर बेचते हैं, उसे ‘मधुमती’ दशकों पहले स्क्रीन पर जी चुकी थी। अगर आपने इसे सिर्फ पुरानी फिल्म समझकर छोड़ दिया, तो समझिए आपने भारतीय सिनेमा का असली DNA मिस कर दिया। जब Bollywood बच्चा था, तब यह फिल्म जवान थी 1958 में बनी मधुमती कोई साधारण फिल्म नहीं थी। यह वो दौर था जब तकनीक सीमित थी, बजट छोटे…
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रेट्रो रिव्यू: ‘बंदिनी’ — एक कैदी नहीं, एक चीख है जो आज भी सुनाई देती है
1963 का सिनेमा अगर आपको सिर्फ ब्लैक एंड व्हाइट फ्रेम्स लगता है, तो Bandini आपको झकझोर देगा। ये फिल्म कोई कहानी नहीं सुनाती, ये सीधे आपके अंदर उतरती है। Bimal Roy ने यहां सिनेमा नहीं बनाया, बल्कि समाज का एक्स-रे कर दिया। और उस एक्स-रे में सबसे बड़ा फ्रैक्चर दिखता है — एक औरत का टूटा हुआ अस्तित्व। कल्याणी: एक नाम नहीं, एक जख्म है कल्याणी, जिसे Nutan ने निभाया, वो सिर्फ एक किरदार नहीं है — वो हर उस औरत की आवाज है जिसे समाज ने पहले इस्तेमाल किया,…
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