कुछ फिल्में सिर्फ देखी नहीं जातीं… वो आपको भीतर तक असहज कर देती हैं। 1959 में आई Sujata ऐसी ही एक फिल्म है—धीमी, सधी हुई, लेकिन भीतर से विस्फोटक। Bimal Roy का निर्देशन, Nutan की आत्मा छू लेने वाली एक्टिंग और Sunil Dutt की सादगी—ये फिल्म किसी लाउड ड्रामा से नहीं, बल्कि खामोशी से वार करती है। कहानी नहीं, समाज का एक्स-रे सुजाता कोई लव स्टोरी नहीं, ये एक सिस्टम की पोल खोलती रिपोर्ट है। एक ब्राह्मण परिवार… एक अनाथ बच्ची… और एक ऐसा सच, जिसे छुपाकर रखा गया—कि वो “अछूत” है। सवाल…
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रेट्रो रिव्यू: ‘बंदिनी’ — एक कैदी नहीं, एक चीख है जो आज भी सुनाई देती है
1963 का सिनेमा अगर आपको सिर्फ ब्लैक एंड व्हाइट फ्रेम्स लगता है, तो Bandini आपको झकझोर देगा। ये फिल्म कोई कहानी नहीं सुनाती, ये सीधे आपके अंदर उतरती है। Bimal Roy ने यहां सिनेमा नहीं बनाया, बल्कि समाज का एक्स-रे कर दिया। और उस एक्स-रे में सबसे बड़ा फ्रैक्चर दिखता है — एक औरत का टूटा हुआ अस्तित्व। कल्याणी: एक नाम नहीं, एक जख्म है कल्याणी, जिसे Nutan ने निभाया, वो सिर्फ एक किरदार नहीं है — वो हर उस औरत की आवाज है जिसे समाज ने पहले इस्तेमाल किया,…
Read More“हवेली, भूत और मोहब्बत का ब्लैक-एंड-व्हाइट जादू: 1949 की ‘महल’
आज के जमाने में हॉरर फिल्म का मतलब होता है तेज़ बैकग्राउंड म्यूज़िक, अचानक कूदता हुआ भूत और दर्शक की चीख. लेकिन 1949 में बनी महल ने डर को अलग अंदाज़ में परोसा. यहां डर चीखता नहीं, फुसफुसाता है. बॉम्बे टॉकीज़ के स्टूडियो में सीमित बजट, अनिश्चित भविष्य और आधा-अधूरा भरोसा लेकर बनी यह फिल्म रिलीज़ के बाद ऐसा धमाका कर गई कि उस दौर के आलोचक भी सिर खुजलाते रह गए. कहानी भूत की कम और मोहब्बत की ज्यादा है. मगर मोहब्बत ऐसी जो मौत, जन्म और समय की…
Read MoreTrip to Moon (1967) रेट्रो रिव्यू: दारा सिंह की चांद पर कुश्ती
बॉलीवुड का 1967 का स्पेस मिशन शुरू होता है बिना किसी नासा या इसरो के – बल्कि दारा सिंह के बाइसेप्स के भरोसे। ‘Trip to Moon’, टी.पी. सुंदरम की बनाई हुई साइंस-फिक्शन फिल्म है, जो आज भी एक मून राइड ऑफ मासाला है। चांद पर सिर्फ झंडा नहीं, मुक्का भी गाड़ा गया! आनंद (दारा सिंह) और उसका साथी भागू (भगवान) चंद्रमा पर उतरते हैं, और सामने आते हैं एलियंस, राक्षस, और दूसरे ग्रह के योद्धा, जो लगते हैं जैसे अमर चित्र कथा और रामलीला के बीच का संकर। फिल्म में…
Read Moreआनंद मठ (1952) रेट्रो रिव्यू: संन्यासियों का विद्रोह और ‘वंदे मातरम्’ की गूंज
1952 की ऐतिहासिक फिल्म ‘आनंद मठ’ को सिर्फ एक “क्लासिक फिल्म” कहना उसके साथ अन्याय होगा। यह फिल्म एक धार्मिक-सांस्कृतिक क्रांति की सिनेमाई व्याख्या है। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के प्रसिद्ध बंगाली उपन्यास पर आधारित यह फिल्म संन्यासी विद्रोह की पृष्ठभूमि में आज़ादी की चिंगारी को एक नया चेहरा देती है। और हां, इसमें ‘साधु-संत’ सिर्फ प्रवचन नहीं, क्रांति का नेतृत्व करते हैं। रेट्रो सिनेमा के लिए इससे ज़्यादा metal कुछ नहीं हो सकता। कहानी में तप और ताव दोनों 18वीं शताब्दी का बंगाल। भूख, भय और फिरंगियों का आतंक। ऐसे…
Read Moreरेट्रो रिव्यू : “बरखा” — तड़पाओगे तड़पा लो, पर इस क्लासिक को मिस मत करो
1959 में जब जगदीप को हीरो बनाया गया, तो सिनेमा प्रेमियों ने भी हैरानी से छाता खोल लिया — “ये वही कॉमिक जगदीप हैं?” लेकिन बरखा में उन्होंने पारंपरिक हीरो के सारे गुण निभाए। सीरियस भी लगे और रोमांटिक भी। और वो सैलाब वाला सीन… तड़पाओगे तड़पा लो बस वही मूड था! नंदा: बारिश में भी भीगी नहीं, बस नज़रों से बहा ले गईं नंदा का रोल पार्वती के रूप में बेहद ग्रेसफुल है। सादगी, समर्पण और संस्कार के ऐसे पैकेज के साथ उन्होंने साबित किया कि बरखा सिर्फ मौसम…
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