नई दिल्ली: कैंसर रोधी दवाओं पर ट्रेड मार्जिन की सीमा तय किए जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से सवाल किया है कि मुनाफे पर नियंत्रण सिर्फ कैंसर की दवाओं तक ही क्यों सीमित रखा गया है। अदालत ने कहा कि कई दूसरी जरूरी दवाओं और चिकित्सा उपकरणों की कीमतों में भी बड़ा अंतर देखने को मिलता है, जिसका सीधा असर मरीजों की जेब पर पड़ता है।
सुप्रीम कोर्ट ने दवाओं और उपकरणों की कीमतों में अंतर पर उठाए सवाल
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि रोजमर्रा की चिकित्सा सामग्री में भी काफी ज्यादा मुनाफा लिया जा रहा है। केंद्र सरकार ने अदालत को बताया कि कैंसर की दवाओं पर व्यापारिक मुनाफे की सीमा अधिकतम खुदरा मूल्य यानी एमआरपी का 30 प्रतिशत तय की गई है।
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि अगर कैंसर जैसी गंभीर बीमारी की दवाओं पर मुनाफे को नियंत्रित किया जा सकता है तो अन्य दवाओं और मेडिकल उपकरणों के मामले में ऐसा क्यों नहीं किया जा रहा।
अदालत ने उदाहरण देते हुए कहा कि एंटीबायोटिक एजिथ्रोमाइसिन की एमआरपी 78.29 रुपये है, जबकि स्टॉकिस्ट को यह 28.50 रुपये में उपलब्ध होती है। इसी तरह सलाइन की ड्रिप लाइन की एमआरपी 11 रुपये है, लेकिन बाजार में यह 270 रुपये तक में बेची गई। कोर्ट ने कहा कि कार्डियक स्टेंट पर 16 प्रतिशत सीमा लगाने से गैर-जरूरी इलाज को कम किया जा सकता है।
सरकार ने कहा- दवाओं की कीमतों में ज्यादा हस्तक्षेप से असर पड़ सकता है
केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि सरकार पूरे दवा बाजार को नियंत्रित करने की दिशा में नहीं जाना चाहती। उन्होंने कहा कि भारत पहले से ही दुनिया के उन देशों में शामिल है, जहां दवाएं अपेक्षाकृत कम कीमत पर उपलब्ध हैं।
सरकार ने तर्क दिया कि कीमतों में ज्यादा हस्तक्षेप करने से दवाओं की उपलब्धता पर असर पड़ सकता है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि सस्ती दवाओं को छोड़कर बाकी स्वीकृत कैंसर दवाओं की सूची समय-समय पर जारी की जाएगी।
इस मामले में अगली सुनवाई 27 अक्टूबर को होगी।
अस्पतालों को मरीजों को पहले बतानी होगी इलाज की दरें
इसी बीच केंद्र सरकार ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि अस्पतालों और अन्य चिकित्सा संस्थानों में इलाज और सुविधाओं की दरें प्रमुखता से प्रदर्शित की जाएं।
केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव पुण्य सलिला श्रीवास्तव ने सभी राज्यों के मुख्य सचिवों को पत्र लिखकर संबंधित नियमों का सख्ती से पालन कराने को कहा है। सरकार का उद्देश्य है कि मरीज और उनके परिजन इलाज शुरू कराने से पहले खर्च की जानकारी हासिल कर सकें और बाद में बिल को लेकर विवादों की स्थिति कम हो।
अस्पतालों में स्थानीय भाषा और अंग्रेजी में लगानी होंगी दरें
सरकार के निर्देश के अनुसार अस्पतालों में इलाज से जुड़ी दरें ऐसी जगह लगाई जानी चाहिए, जहां मरीज और उनके परिजन उन्हें आसानी से देख सकें।
जिन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट एक्ट, 2010 और केंद्रीय नियम, 2012 लागू हैं, वहां सभी चिकित्सा सेवाओं और सुविधाओं की दरें स्थानीय भाषा के साथ अंग्रेजी में प्रदर्शित करना जरूरी होगा।
वहीं, जिन राज्यों में यह कानून लागू नहीं है, वहां अस्पतालों को संबंधित राज्य के नियमों के अनुसार व्यवस्था करनी होगी। स्वास्थ्य सचिव ने राज्यों से कहा है कि वे अधिकारियों के माध्यम से नियमों का पालन सुनिश्चित कराएं और अस्पतालों को आवश्यक निर्देश जारी करें।
विदेशी मरीजों के लिए इलाज पैकेज की दरें बताने पर जोर
केंद्र सरकार ने मेडिकल और आयुष वीजा के जरिए भारत आने वाले विदेशी मरीजों के लिए इलाज पैकेज की दरें भी स्पष्ट रूप से बताने को प्रोत्साहित किया है।
सरकार का मानना है कि इससे विदेशी मरीज इलाज का खर्च पहले से समझ सकेंगे, बेहतर विकल्प चुन पाएंगे और बिल से जुड़ी शिकायतों में कमी आएगी। साथ ही भारत की चिकित्सा और आयुष सेवाओं पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भरोसा भी मजबूत होगा।
