UP समेत 5 चुनावी राज्यों में अक्टूबर में बदल सकती है वोटर लिस्ट! EC कर सकता है SSR का आदेश, दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों से गरमाया मामला

नई दिल्ली: चुनाव आयोग अक्टूबर में उत्तर प्रदेश समेत पांच चुनावी राज्यों की मतदाता सूचियों का विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण यानी SSR कराने का आदेश दे सकता है। इसमें उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर शामिल हैं। इसके लिए 1 जनवरी 2027 को अर्हता तिथि माना जा सकता है। चुनावी राज्यों में विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची को अपडेट करने की यह प्रक्रिया महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

हालांकि, इस साल पूरे देश में एक साथ SSR कराने की संभावना कम बताई जा रही है। इसकी एक वजह 19 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में चल रहा SIR का तीसरा चरण है। इसके अलावा देश में जनगणना की प्रक्रिया भी जारी है। रिपोर्टों के मुताबिक, दो चुनाव आयुक्तों ने इस बात पर आपत्ति जताई थी कि 1 जनवरी 2025 के बाद देशभर में SSR क्यों नहीं कराया गया।

SIR और SSR में क्या होता है अंतर?

SIR यानी विशेष गहन पुनरीक्षण में मतदाता सूची की व्यापक और विस्तृत जांच की जाती है। इसमें मतदाताओं की पात्रता और सूची में दर्ज विवरणों का सत्यापन किया जाता है, ताकि पात्र लोगों के नाम शामिल किए जा सकें और अपात्र या गलत प्रविष्टियों की पहचान की जा सके।

वहीं SSR यानी विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण का मकसद मौजूदा मतदाता सूची को अपडेट करना होता है। इसमें नए पात्र मतदाताओं के नाम जोड़ने, गलतियों को सुधारने और जरूरी संशोधन करने की प्रक्रिया शामिल होती है। आसान भाषा में कहें तो SIR में मतदाता सूची की गहन जांच होती है, जबकि SSR में मौजूदा सूची को संशोधित और अपडेट किया जाता है।

इन पांच राज्यों में हो सकता है SSR

चुनाव आयोग अक्टूबर में जिन राज्यों में विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण करा सकता है, उनमें उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर शामिल हैं।

इन राज्यों में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में चुनाव आयोग चुनाव से पहले मतदाता सूची को अपडेट करने की प्रक्रिया शुरू कर सकता है। इसके लिए 1 जनवरी 2027 को अर्हता तिथि बनाए जाने की संभावना है।

देशभर में SSR कराने की संभावना कम

रिपोर्टों के मुताबिक, चुनाव आयोग के सामने इस समय SIR के तीसरे चरण की प्रक्रिया बड़ी वजह है। 2026 में 19 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को SIR के तीसरे चरण में शामिल किया गया है। इसके अलावा बिहार में SIR की प्रक्रिया कुछ महीने पहले पूरी हुई थी, जबकि 2025 के अंत में करीब एक दर्जन राज्यों में भी यह प्रक्रिया चल रही थी।

इसी वजह से इस साल पूरे देश में एक साथ SSR कराने की संभावना कम बताई जा रही है। हालांकि चुनावी राज्यों में विधानसभा चुनाव को देखते हुए मतदाता सूची के विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण की प्रक्रिया अलग से कराई जा सकती है।

जनगणना की वजह से भी चुनौती

देशव्यापी SSR को लेकर जनगणना की प्रक्रिया भी एक अहम factor है। जनगणना का पहला चरण 1 अप्रैल से 30 सितंबर 2026 के बीच निर्धारित किया गया था। वहीं, लद्दाख और जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश तथा उत्तराखंड के बर्फीले इलाकों में दूसरे चरण की प्रक्रिया भी चल रही है।

अगले साल की शुरुआत में विधानसभा चुनाव वाले राज्यों को ध्यान में रखते हुए जनगणना की समय-सारणी में भी बदलाव किया गया है। ऐसे में चुनाव आयोग को मतदाता सूची के पुनरीक्षण और जनगणना की प्रक्रिया के बीच तालमेल रखना होगा।

चुनाव से पहले क्यों होता है मतदाता सूची का पुनरीक्षण?

चुनाव आयोग चुनावी राज्यों में SSR जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 21 के तहत करा सकता है। इस प्रावधान में चुनाव या उपचुनाव से पहले संबंधित अर्हता तिथि के आधार पर मतदाता सूची के पुनरीक्षण का प्रावधान है।

इस प्रक्रिया के दौरान पात्र नए मतदाताओं के नाम जोड़ने, मतदाता सूची में मौजूद गलतियों को सुधारने और जरूरी बदलाव करने का काम किया जाता है। अगले साल विधानसभा चुनाव वाले राज्यों में इसी प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची को अपडेट किया जा सकता है।

दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों से क्यों उठा विवाद?

रिपोर्टों के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 1 जनवरी 2025 के बाद देशव्यापी SSR नहीं कराए जाने पर आपत्ति जताई थी। इसके अलावा मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR के दौरान नाम हटाए जाने से जुड़े मुद्दों पर भी दोनों चुनाव आयुक्तों की ओर से चिंता जताए जाने की बात सामने आई है।

एक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले कुछ महीनों में निर्णय लेने की प्रक्रिया के दौरान करीब 14 बार आपत्तियां दर्ज की गईं। इनमें मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने से जुड़े मामलों समेत कुछ अन्य चुनावी प्रक्रियाओं से संबंधित मुद्दे शामिल बताए गए हैं।

चुनाव आयोग ने क्या कहा?

इन रिपोर्टों पर चुनाव आयोग की ओर से कहा गया है कि किसी भी संस्थान में विचार-विमर्श के दौरान अलग-अलग राय और टिप्पणियां सामने आना सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है। आयोग के मुताबिक उसके आदेश पिछले एक साल में लिए गए सर्वसम्मत फैसलों का परिणाम हैं।

आयोग के अधिकारियों ने यह भी कहा है कि देशभर में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़े फैसलों में आयोग के भीतर पूरी सहमति थी।

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