भगवान राम के अयोध्या लौटने से कैसे जुड़ी दीवाली? रामायण से पुराणों तक जानिए दीपोत्सव की पूरी कहानी

नई दिल्ली: दीपावली को लेकर देशभर में कई धार्मिक मान्यताएं और परंपराएं प्रचलित हैं। इनमें सबसे लोकप्रिय मान्यता भगवान श्रीराम के 14 वर्ष का वनवास पूरा करने के बाद अयोध्या लौटने से जुड़ी है। माना जाता है कि राम, माता सीता और लक्ष्मण के अयोध्या पहुंचने पर नगरवासियों ने खुशी में दीप जलाकर उनका स्वागत किया था। इसी परंपरा को आज भी उत्तर भारत में दीपावली से जोड़कर देखा जाता है।

हालांकि, इस कथा से जुड़ा एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि मूल वाल्मीकि रामायण में भगवान राम की वापसी के समय पूरे नगर में दीपकों की कतारें जलाने का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता। ऐसे में सवाल उठता है कि राम के अयोध्या आगमन और दीपावली के बीच संबंध की परंपरा कैसे विकसित हुई?

भगवान राम की अयोध्या वापसी से कैसे जुड़ी दीपावली?

रामायण के अनुसार, राजा दशरथ के वचन का पालन करने के लिए भगवान राम ने माता सीता और भाई लक्ष्मण के साथ 14 वर्ष का वनवास स्वीकार किया था। वनवास के दौरान रावण ने छल से माता सीता का हरण कर उन्हें लंका में बंदी बना लिया।

इसके बाद भगवान राम ने सुग्रीव, हनुमान और वानर सेना की सहायता से रावण के विरुद्ध युद्ध किया और विजय प्राप्त कर माता सीता को मुक्त कराया। वनवास की अवधि पूरी होने के बाद राम, सीता और लक्ष्मण अयोध्या लौटने के लिए रवाना हुए।

भरत ने राम को सौंपा अयोध्या का राजपाट

वाल्मीकि रामायण में वर्णन मिलता है कि वनवास पूरा होने के बाद भगवान राम पुष्पक विमान से अयोध्या की ओर लौटे। उनके साथ माता सीता, लक्ष्मण, सुग्रीव, विभीषण और वानर सेना के सदस्य भी थे।

इस दौरान भरत नंदीग्राम में रहकर भगवान राम की वापसी की प्रतीक्षा कर रहे थे। उन्होंने राम की पादुकाओं को सिंहासन पर रखकर उनके प्रतिनिधि के रूप में राज्य का संचालन किया था। राम के लौटने पर दोनों भाइयों का मिलन हुआ और भरत ने उन्हें अयोध्या का राजपाट सौंप दिया। इसके बाद भगवान राम का राज्याभिषेक हुआ।

क्या वाल्मीकि रामायण में दीप जलाने का जिक्र है?

भगवान राम की वापसी को दीपावली से जोड़ने वाली मान्यता बेहद प्रचलित है, लेकिन मूल वाल्मीकि रामायण में अयोध्या के घर-घर में दीपक जलाकर दीपावली मनाने का स्पष्ट वर्णन या ऐसा कोई अलग श्लोक नहीं मिलता।

राम के स्वागत के लिए अयोध्या को तोरण, फूलों की मालाओं, ध्वजा-पताकाओं और सुगंधित धूप से सजाने का उल्लेख जरूर मिलता है। राम के आगमन पर नगर में उत्सव और उल्लास का माहौल था।

बाद की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में भगवान राम की अयोध्या वापसी की खुशी में दीप जलाने की मान्यता मजबूत होती गई। खासकर उत्तर भारत में दीपावली को राम के वनवास से लौटने और अयोध्या में उनके स्वागत के पर्व के रूप में मनाया जाने लगा।

पुराणों में दीपदान और लक्ष्मी पूजा का महत्व

दीपावली का धार्मिक महत्व केवल भगवान राम की वापसी तक सीमित नहीं है। पद्मपुराण और स्कंदपुराण जैसे ग्रंथों में कार्तिक अमावस्या के अवसर पर दीपदान और मां लक्ष्मी की पूजा का उल्लेख मिलता है।

इन धार्मिक परंपराओं के कारण कार्तिक अमावस्या पर दीप जलाना, घरों को रोशन करना और लक्ष्मी पूजन करना दीपोत्सव का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया। समय के साथ अलग-अलग क्षेत्रों में दीपावली से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं और रीति-रिवाजों का विस्तार हुआ।

धर्म की जीत और अंधकार पर प्रकाश का प्रतीक है दीपावली

इस तरह दीपावली का संबंध भगवान राम की अयोध्या वापसी की लोकप्रिय मान्यता, दीपदान की धार्मिक परंपरा और मां लक्ष्मी की पूजा से मिलकर बना है। आज यह पर्व केवल दीप जलाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे अधर्म पर धर्म की जीत, अंधकार पर प्रकाश और बुराई पर अच्छाई की विजय के प्रतीक के रूप में भी मनाया जाता है।

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