नई दिल्ली: केंद्रीय शिक्षा मंत्री पद से धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा उनके राजनीतिक जीवन का एक बड़ा मोड़ माना जा रहा है। छात्र राजनीति से शुरुआत करने वाले धर्मेंद्र प्रधान ने भारतीय जनता पार्टी के संगठन से लेकर केंद्र सरकार तक कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के क्रियान्वयन से लेकर कई राज्यों में चुनावी रणनीति तैयार करने तक उन्होंने अहम भूमिका निभाई। हालांकि, कथित नीट पेपर लीक विवाद को लेकर देशभर में बढ़ते विरोध प्रदर्शनों के बीच उन्होंने प्रधानमंत्री को अपना इस्तीफा सौंप दिया।
नीट विवाद के बीच दिया इस्तीफा
शिक्षा मंत्री के रूप में धर्मेंद्र प्रधान राष्ट्रीय शिक्षा नीति के क्रियान्वयन का प्रमुख चेहरा रहे। लेकिन कथित नीट पेपर लीक मामले को लेकर लगातार बढ़ते विरोध और आंदोलन के बीच उन्होंने पद छोड़ दिया। उनके इस्तीफे को सरकार के शुरुआती रुख में बड़े बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है।
विवाद के बाद इस्तीफा देने वाले मोदी सरकार के दूसरे मंत्री
धर्मेंद्र प्रधान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में किसी सार्वजनिक विवाद के बाद इस्तीफा देने वाले दूसरे केंद्रीय मंत्री बने हैं। इससे पहले वर्ष 2018 में ‘मी टू’ अभियान के दौरान लगे आरोपों के बाद एम.जे. अकबर ने विदेश राज्य मंत्री पद से इस्तीफा दिया था। वहीं किसी विवाद के बाद पद छोड़ने वाले वह देश के दूसरे शिक्षा मंत्री भी हैं। इससे पहले वर्ष 1967 में एम.सी. छागला ने नीतिगत और राजनीतिक मतभेदों के चलते शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा दिया था।
एबीवीपी से शुरू हुआ राजनीतिक सफर
धर्मेंद्र प्रधान ने वर्ष 1983 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ता के रूप में अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की। वह तीन बार केंद्रीय मंत्री रहे और संगठन में लगातार महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाते रहे। पूर्व केंद्रीय मंत्री देवेंद्र प्रधान के पुत्र धर्मेंद्र प्रधान भारतीय जनता पार्टी के भरोसेमंद रणनीतिकारों में गिने जाते रहे हैं।
कई राज्यों में चुनावी जिम्मेदारियां संभालीं
भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2017 और उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी थीं। ओडिशा में पार्टी के विस्तार की रणनीति में भी उन्होंने अहम भूमिका निभाई, जहां वर्ष 2024 में भाजपा ने पहली बार अपने दम पर सरकार बनाई। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2021 में उन्हें नंदीग्राम सीट की जिम्मेदारी दी गई थी, जहां तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी चुनाव मैदान में थीं।
2000 में लड़ा पहला चुनाव, संगठन में बढ़ता गया कद
धर्मेंद्र प्रधान ने वर्ष 2000 में ओडिशा की पल्लाहारा विधानसभा सीट से अपना पहला चुनाव लड़ा। इसके बाद वर्ष 2004 में देवगढ़ लोकसभा सीट से चुनाव मैदान में उतरे। वर्ष 2009 का लोकसभा चुनाव हारने के बाद उन्होंने संगठन में सक्रिय भूमिका निभाई। वर्ष 2010 में उन्हें भाजपा का राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया और वर्ष 2012 में वह बिहार से राज्यसभा सदस्य चुने गए।
मोदी सरकार में मिली बड़ी जिम्मेदारियां
वर्ष 2014 में केंद्र में सरकार बनने के बाद धर्मेंद्र प्रधान को स्वतंत्र प्रभार के साथ पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस राज्य मंत्री बनाया गया। बाद में उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा मिला और कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय की अतिरिक्त जिम्मेदारी भी सौंपी गई। वर्ष 2021 में उन्हें केंद्रीय शिक्षा मंत्री और कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्री बनाया गया। शिक्षा मंत्री के तौर पर उनके कार्यकाल में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के क्रियान्वयन पर विशेष जोर दिया गया।
‘उज्ज्वला मैन’ के नाम से मिली पहचान
गरीब परिवारों को मुफ्त एलपीजी कनेक्शन उपलब्ध कराने वाली उज्ज्वला योजना के प्रभावी क्रियान्वयन के कारण धर्मेंद्र प्रधान को ‘उज्ज्वला मैन’ के नाम से भी पहचान मिली। उन्हें पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय में सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले केंद्रीय मंत्रियों में भी गिना जाता है।
2024 में 15 साल बाद लोकसभा पहुंचे
वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में धर्मेंद्र प्रधान ने ओडिशा की संबलपुर सीट से जीत दर्ज कर 15 वर्ष बाद लोकसभा में वापसी की। उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी को 1.19 लाख से अधिक मतों के अंतर से हराया। इसके बाद मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल में उन्हें एक बार फिर शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी गई। ओडिशा में भाजपा की सरकार बनने के बाद उन्हें राज्य के मुख्यमंत्री पद के संभावित दावेदारों में भी माना गया था।
