‘रामायण’ के प्रचार में मर्यादा भूले मेजबान? मिस्टरबीस्ट के इंतजार में घंटों बैठे पत्रकार, सुनना पड़ा- ‘जिसे जाना है, चला जाए’

मुंबई (सैयद ज़िशान हैदर रिज़वी): जिस टी-सीरीज को कभी यूट्यूब की नंबर-1 कुर्सी से हटाने की होड़ में मिस्टरबीस्ट ने उसके मालिक भूषण कुमार को बॉक्सिंग मैच तक की चुनौती दे डाली थी, वही मिस्टरबीस्ट अब ‘रामायण’ के प्रचार के लिए मुंबई पहुंचे। दिलचस्प बात यह है कि फिल्म का संगीत टी-सीरीज के पास है। कार्यक्रम प्राइम फोकस की ओर से आयोजित किया गया था, लेकिन जिस आयोजन के लिए पत्रकारों को बुलाया गया, वहां उनका इंतजार घंटों तक चलता रहा। कार्यक्रम तय समय से काफी देर बाद शुरू हुआ और इंतजार कर रहे पत्रकारों को कथित तौर पर यह तक सुनना पड़ा कि जिसे जाना है, वह जा सकता है।

सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि कार्यक्रम देर से क्यों शुरू हुआ। बड़ा सवाल यह है कि क्या आज के फिल्म प्रचार में पत्रकार को सिर्फ इंतजार करने वाला दर्शक समझ लिया गया है? और अगर किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय सितारे के आने में देरी हो जाए, तो क्या उसका बोझ उन पत्रकारों पर डाल देना जायज है जिन्हें बाकायदा कार्यक्रम के लिए बुलाया गया था?

डेढ़ बजे का कार्यक्रम, घंटों इंतजार और कोई जवाब नहीं

शनिवार को ‘रामायण’ से जुड़े इस कार्यक्रम का आयोजन डीएनईजी के दफ्तर में किया गया था। पत्रकार तय समय पर पहुंच गए। बैठने, बातचीत और इंतजार के बीच कुछ समय तो निकल गया, लेकिन धीरे-धीरे मिनटों ने घंटों का रूप ले लिया।

सबसे बड़ी परेशानी यह रही कि कार्यक्रम कब शुरू होगा, इसकी स्पष्ट जानकारी पत्रकारों को नहीं दी जा रही थी। इंतजार कर रहे लोगों के लिए समय का कोई निश्चित जवाब नहीं था।

बाद में बताया गया कि मिस्टरबीस्ट की निजी उड़ान छूट जाने की वजह से कार्यक्रम में देरी हुई। वजह अपनी जगह हो सकती है, लेकिन सवाल फिर वही है- जिन्हें कार्यक्रम में बुलाया गया था, उन्हें समय पर जानकारी देना किसकी जिम्मेदारी थी?

‘जिसे जाना है, चला जाए’… क्या यही है स्टारडम का नया प्रोटोकॉल?

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, जब पत्रकारों ने कार्यक्रम में हो रही देरी को लेकर सवाल किया तो आयोजकों की ओर से कहा गया कि जिसे जाना हो, वह जा सकता है। कुछ पत्रकार वहां से चले भी गए।

रिपोर्ट्स में रणबीर कपूर की ओर से भी इसी आशय की बात कहे जाने का जिक्र है। यानी उड़ान मिस्टरबीस्ट की छूटी, लेकिन उसकी कीमत उन पत्रकारों ने चुकाई जो समय पर कार्यक्रम स्थल पर पहुंच चुके थे।

यहीं से मामला महज देरी का नहीं रह जाता। सवाल व्यवहार का हो जाता है। किसी स्टार या अंतरराष्ट्रीय सेलिब्रिटी का इंतजार करना पत्रकार की नौकरी का हिस्सा हो सकता है, लेकिन क्या उसे यह महसूस कराना भी जरूरी है कि अगर इंतजार नहीं करना तो रास्ता खुला है?

पत्रकार किसी स्टार के दरबार में हाजिरी लगाने नहीं आता

हिंदी सिनेमा में सितारों और मीडिया के बीच लंबे समय से एक खास रिश्ता रहा है। बड़े सितारों के कार्यक्रमों में पत्रकारों का इंतजार करना कोई नई बात नहीं है। अतीत में भी जन्मदिन और फिल्म प्रचार से जुड़े आयोजनों में देश के अलग-अलग हिस्सों से पहुंचे पत्रकारों को घंटों इंतजार करना पड़ा है।

लेकिन एक बुनियादी बात शायद भूल जाती है- पत्रकार किसी स्टार के दरबार में हाजिरी लगाने नहीं आता। उसे खबर कवरेज के लिए बुलाया जाता है। वह अपना समय देता है, कार्यक्रम में पहुंचता है और वहां से खबर लेकर लौटता है।

इसलिए कार्यक्रम आयोजित करने वालों की जिम्मेदारी सिर्फ स्टार की मौजूदगी सुनिश्चित करना नहीं, बल्कि वहां बुलाए गए पत्रकारों के समय और गरिमा का सम्मान करना भी है।

‘रामायण’ की कहानी और कार्यक्रम का व्यवहार… यहीं सबसे बड़ा विरोधाभास

इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा चुभने वाली बात यही है कि कार्यक्रम जिस फिल्म के प्रचार के लिए था, वह ‘रामायण’ है।

राम की कथा में शबरी के बेर हैं, निषादराज के प्रति सम्मान है, शरण में आए व्यक्ति के लिए जगह है और मर्यादा को सबसे ऊपर रखा गया है। ऐसे में उसी कथा पर बन रही फिल्म के प्रचार कार्यक्रम में आमंत्रित पत्रकारों को घंटों इंतजार कराने के बाद यह कहना कि जाना है तो चले जाइए, कम से कम विडंबनापूर्ण जरूर लगता है।

फिल्म अभी पर्दे पर आई भी नहीं है, लेकिन उसके प्रचार कार्यक्रम ने ‘मर्यादा’ शब्द पर बहस जरूर छेड़ दी है।

मिस्टरबीस्ट कौन हैं और क्यों बना इतना बड़ा इंतजार?

मिस्टरबीस्ट का असली नाम जिमी डोनाल्डसन है। सोशल मीडिया पर उनके वीडियो बड़े पैमाने पर देखे जाते हैं। उनके कंटेंट में जरूरतमंद लोगों की मदद, इलाज, आर्थिक सहायता और बड़े इनाम जैसी चीजें दिखाई जाती हैं।

उनकी लोकप्रियता का एक बड़ा आधार यही है कि मदद और मनोरंजन को एक साथ पेश किया जाता है। हालांकि, इसी मॉडल को लेकर समय-समय पर सवाल भी उठते रहे हैं कि दूसरों की मुश्किलों और जरूरतों को कैमरे के सामने दिखाने की सीमा कहां तक होनी चाहिए।

उनके कामकाज को लेकर पूर्व कर्मचारियों की शिकायतें भी सामने आई हैं। कंपनी की ओर से कराई गई जांच में कार्यस्थल पर अनुचित व्यवहार के कुछ मामले सामने आने की रिपोर्ट रही है। वहीं ‘बीस्ट गेम्स’ के प्रतिभागियों ने भोजन, चिकित्सा सहायता और सुरक्षा से जुड़े आरोपों को लेकर मुकदमा भी किया है। कंपनी इन आरोपों का सामना कर रही है।

यानी कैमरे के सामने दिखाई देने वाली छवि के अलावा कैमरे के पीछे उनके काम करने के तरीके को लेकर भी बहस होती रही है।

भूषण कुमार को बॉक्सिंग की चुनौती से ‘रामायण’ के प्रचार तक

मिस्टरबीस्ट और टी-सीरीज की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। करीब दो साल पहले दोनों के बीच यूट्यूब पर नंबर-1 बनने की होड़ चर्चा में थी। इसी दौरान मिस्टरबीस्ट ने टी-सीरीज के मालिक भूषण कुमार को बॉक्सिंग मैच की चुनौती तक दे दी थी।

आज तस्वीर बिल्कुल अलग है। वही मिस्टरबीस्ट ‘रामायण’ के प्रचार कार्यक्रम में मुंबई पहुंचते हैं और फिल्म का संगीत टी-सीरीज जारी कर रही है।

कारोबार में पुरानी प्रतिद्वंद्विता का खत्म होना या नए रिश्ते बनना कोई असामान्य बात नहीं। मनोरंजन उद्योग में प्रतिस्पर्धा और साझेदारी अक्सर साथ-साथ चलती हैं।

लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में असली सवाल मिस्टरबीस्ट और टी-सीरीज से भी आगे का है।

वैश्विक मेहमान जरूरी, लेकिन पत्रकार का समय क्यों नहीं?

अगर किसी अंतरराष्ट्रीय स्टार की उड़ान छूट गई, कार्यक्रम में देरी हो गई या शेड्यूल बिगड़ गया, तो उसे संभालना आयोजकों का काम है। लेकिन उन पत्रकारों को घंटों इंतजार कराने के बाद विकल्प के तौर पर ‘जिसे जाना है, चला जाए’ देना मीडिया मैनेजमेंट का कौन सा नया मॉडल है?

स्टार की लोकप्रियता अपनी जगह है। वैश्विक पहचान अपनी जगह है। लेकिन किसी कार्यक्रम में आमंत्रित पत्रकार का समय भी उतना ही वास्तविक है।

प्रचार फिल्म का होना था, खबर ‘रामायण’ की बननी थी और चर्चा मिस्टरबीस्ट की होनी थी। मगर कार्यक्रम के बाद सवाल फिल्म से ज्यादा उस रवैये पर खड़ा हो गया, जिसमें मेहमान के इंतजार में मेजबान अपने ही बुलाए पत्रकारों को इंतजार की कतार में खड़ा कर देता है।

कल की दुश्मनी आज की साझेदारी हो सकती है, लेकिन शिष्टाचार का क्या?

टी-सीरीज और मिस्टरबीस्ट के बीच कभी यूट्यूब नंबर-1 की लड़ाई थी, आज ‘रामायण’ के प्रचार में दोनों एक ही कहानी के अलग-अलग हिस्से नजर आ रहे हैं। यही मनोरंजन कारोबार की खासियत है- प्रतिस्पर्धी कभी साझेदार बन जाते हैं और पुरानी चुनौती नई व्यावसायिक साझेदारी में बदल जाती है।

इसमें कोई समस्या नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब कारोबार की चमक में बुनियादी शिष्टाचार पीछे छूट जाए।

किसी फिल्म का प्रचार कितना बड़ा है, यह उसके सितारों और मेहमानों से तय हो सकता है। लेकिन किसी कार्यक्रम की गरिमा इस बात से भी तय होती है कि वहां पहुंचे लोगों के साथ कैसा व्यवहार हुआ।

और ‘रामायण’ के प्रचार से निकला यह सवाल शायद सबसे ज्यादा असहज करने वाला है- अगर मर्यादा पुरुषोत्तम की कहानी बेचनी है, तो क्या उसके प्रचार में कम से कम पत्रकारों के समय की मर्यादा भी नहीं रखी जा सकती?

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