बेंगलुरु (ज़ीशान हैदर): कर्नाटक में कांग्रेस की राजनीति अब एक नए दौर में है। जिस पार्टी ने 2023 के विधानसभा चुनाव में बड़ी जीत के बाद राज्य में सत्ता हासिल की थी, वही कांग्रेस अब विधान परिषद की चार सीटों के चुनाव में अपना खाता तक नहीं खोल सकी। भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने तीन सीटें जीतीं, जबकि उसकी सहयोगी जनता दल सेक्युलर (JDS) ने एक सीट पर कब्जा जमाया। इस नतीजे ने पार्टी की चुनावी रणनीति, संगठन और नेतृत्व को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सिद्धारमैया के दौर में कांग्रेस की ताकत क्या थी?
कर्नाटक में सिद्धारमैया केवल मुख्यमंत्री नहीं थे, बल्कि कांग्रेस की एक खास राजनीतिक रणनीति का चेहरा भी थे। उनकी राजनीति में पिछड़े वर्गों, दलितों और अल्पसंख्यकों को साथ लाने की कोशिश अहम रही। AHINDA के नाम से पहचाने जाने वाले इस सामाजिक समीकरण के जरिए उन्होंने व्यापक सामाजिक समर्थन तैयार करने की राजनीति की। उनके नेतृत्व की पहचान कल्याणकारी योजनाओं और सामाजिक न्याय के मुद्दों से भी जुड़ी रही।
2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की जीत के बाद सिद्धारमैया को मुख्यमंत्री बनाया गया, जबकि डीके शिवकुमार उपमुख्यमंत्री बने। दोनों नेताओं की अपनी-अपनी राजनीतिक ताकत थी। सिद्धारमैया को सामाजिक कल्याण और पिछड़े वर्गों से जुड़े मुद्दों पर मजबूत पहचान वाला नेता माना जाता रहा, वहीं शिवकुमार पार्टी संगठन, चुनावी प्रबंधन और संसाधन जुटाने की क्षमता के लिए जाने जाते हैं। कांग्रेस की सत्ता में वापसी के दौरान इन दोनों नेताओं की भूमिका महत्वपूर्ण रही।
सिद्धारमैया के कार्यकाल में सरकार की गारंटी योजनाएं भी कांग्रेस की राजनीति का अहम हिस्सा रहीं। पार्टी के सामने चुनौती यह थी कि इन योजनाओं के जरिए तैयार हुई राजनीतिक स्वीकार्यता को लगातार बनाए रखा जाए और उसे स्थानीय चुनावों में भी समर्थन में बदला जाए। ऐसे में नेतृत्व परिवर्तन के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कांग्रेस अपनी पुरानी सामाजिक और राजनीतिक पकड़ को नए नेतृत्व के तहत भी उतनी ही मजबूती से बनाए रख पाएगी?
मुख्यमंत्री की कुर्सी बदली, कांग्रेस के सामने नई परीक्षा
मई 2026 के अंत में सिद्धारमैया ने मुख्यमंत्री पद छोड़ा और डीके शिवकुमार ने नेतृत्व संभाला। शिवकुमार ने 3 जून को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। इस बदलाव के साथ कांग्रेस के सामने केवल सरकार चलाने की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर एक नए नेतृत्व को स्थापित करने की चुनौती भी आई।नेतृत्व परिवर्तन का मतलब यह नहीं कि कांग्रेस की पूरी राजनीतिक ताकत तुरंत बदल गई। लेकिन मुख्यमंत्री बदलने के बाद पार्टी को यह सुनिश्चित करना होता है कि पुराने नेतृत्व के समर्थकों, संगठन के कार्यकर्ताओं और अलग-अलग सामाजिक समूहों के बीच तालमेल बना रहे। किसी भी पार्टी के लिए सत्ता का हस्तांतरण केवल मुख्यमंत्री बदलने तक सीमित नहीं होता; उसे अपने राजनीतिक संदेश और संगठनात्मक प्राथमिकताओं को भी नए नेतृत्व के साथ जोड़ना पड़ता है।
कर्नाटक में कांग्रेस के सामने भी यही चुनौती है। सिद्धारमैया की राजनीतिक पहचान और शिवकुमार की संगठनात्मक शैली अलग-अलग रही हैं। अब यह देखना होगा कि पार्टी इन दोनों अनुभवों को एक साझा रणनीति में कैसे बदलती है। MLC चुनाव में मिली हार ने इस सवाल को और चर्चा में ला दिया है, हालांकि इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि हार की एकमात्र वजह नेतृत्व परिवर्तन ही था।
चार MLC सीटों पर हार ने क्यों बढ़ाई कांग्रेस की चिंता?
कर्नाटक विधान परिषद की चार सीटों के लिए 23 अक्टूबर को मतदान हुआ था। नतीजों में BJP ने उत्तर-पूर्व शिक्षक, दक्षिण-पूर्व स्नातक और पश्चिम स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में जीत हासिल की। JDS ने बेंगलुरु शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में कांग्रेस को हराकर गठबंधन की चौथी सीट भी अपने नाम कर ली। इस तरह कांग्रेस चारों सीटों पर हार गई। इन चुनावों को BJP और JDS के बीच तालमेल की परीक्षा के तौर पर देखा जा रहा था। दोनों दलों ने मिलकर उम्मीदवारों के पक्ष में समर्थन जुटाने की कोशिश की और नतीजों में उन्हें सफलता मिली। कांग्रेस के लिए मुश्किल यह रही कि वह अपनी मौजूदा सीट भी नहीं बचा सकी और दूसरी सीटों पर भी जीत दर्ज नहीं कर पाई।
हालांकि, यह समझना जरूरी है कि शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्र सामान्य विधानसभा चुनाव से अलग होते हैं। इनमें मतदाताओं का दायरा सीमित होता है और स्थानीय मुद्दों, उम्मीदवारों की पकड़ तथा संबंधित वर्गों के समीकरणों का प्रभाव भी महत्वपूर्ण हो सकता है। इसलिए इन चार सीटों के नतीजों को पूरे कर्नाटक के मतदाताओं की राय मान लेना सही नहीं होगा। फिर भी, सत्तारूढ़ पार्टी के लिए इन सभी सीटों पर हार राजनीतिक रूप से असहज करने वाली है।
बेंगलुरु की सीट पर JDS की जीत ने कांग्रेस को कैसे घेरा?
बेंगलुरु शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में JDS उम्मीदवार एपी रंगनाथ ने कांग्रेस के मौजूदा MLC पुट्टन्ना को 908 वोटों से हराया। रंगनाथ को 10,810 वोट मिले, जबकि पुट्टन्ना को 9,902 वोट हासिल हुए। पुट्टन्ना 2023 के विधानसभा चुनाव से पहले JDS छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुए थे। यह मुकाबला इसलिए भी चर्चा में आया क्योंकि कांग्रेस इस सीट को बचाने में नाकाम रही। चुनाव के नतीजों के बाद JDS नेता निखिल कुमारस्वामी ने राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए कहा कि इस बार EVM को दोष देने का मौका नहीं है, क्योंकि मतदान बैलेट पेपर से हुआ था और राज्य में कांग्रेस की सरकार है। उन्होंने कांग्रेस से पूछा कि अब वह किस बात का बहाना बनाएगी।
यह बयान राजनीतिक कटाक्ष है, न कि चुनाव में हार के कारणों का अंतिम प्रमाण। लेकिन इससे कांग्रेस के सामने एक अलग चुनौती पैदा हुई है। पार्टी लगातार बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग करती रही है, ऐसे में बैलेट पेपर से हुए इस चुनाव में हार को विपक्ष ने उसी बहस से जोड़ दिया। अब कांग्रेस को अपनी चुनावी हार का जवाब देने के साथ-साथ विपक्ष के इस हमले का सामना भी करना पड़ रहा है।
सिद्धारमैया की राजनीतिक विरासत और शिवकुमार की चुनौती
सिद्धारमैया के नेतृत्व में कांग्रेस ने सामाजिक कल्याण और AHINDA जैसे सामाजिक समीकरणों को अपनी राजनीति के केंद्र में रखा। दूसरी ओर, डीके शिवकुमार की पहचान पार्टी संगठन और चुनावी प्रबंधन में सक्रिय भूमिका निभाने वाले नेता की रही है। नेतृत्व परिवर्तन के बाद कांग्रेस के लिए चुनौती इन दोनों तरह की राजनीतिक ताकतों को साथ लेकर चलने की है। यदि पार्टी का सामाजिक आधार मजबूत बना रहता है, लेकिन स्थानीय चुनावों में संगठनात्मक प्रदर्शन कमजोर होता है, तो केवल कल्याणकारी योजनाओं के भरोसे हर मुकाबले में जीत हासिल करना आसान नहीं होगा। इसी तरह, मजबूत संगठन भी तभी राजनीतिक लाभ दे सकता है जब पार्टी का संदेश मतदाताओं तक प्रभावी ढंग से पहुंचे और स्थानीय स्तर पर उम्मीदवारों की पकड़ बनी रहे।
कर्नाटक के MLC नतीजे इस लिहाज से कांग्रेस के लिए समीक्षा का अवसर हैं। पार्टी को देखना होगा कि शिक्षक और स्नातक मतदाताओं के बीच उसके उम्मीदवार क्यों पिछड़े, गठबंधन के सामने उसका चुनावी तालमेल कितना प्रभावी रहा और स्थानीय स्तर पर संगठन ने कितनी मजबूती से काम किया। इन सवालों के जवाब के बिना केवल नेतृत्व परिवर्तन को हार की वजह बताना अधूरा विश्लेषण होगा।
क्या कांग्रेस की सरकार पर संकट है? आंकड़े क्या बताते हैं
चार सीटों पर हार के बावजूद विधान परिषद में कांग्रेस की स्थिति तुरंत कमजोर होकर बहुमत से बाहर होती नजर नहीं आती। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 75 सदस्यीय विधान परिषद में कांग्रेस के 38 सदस्य, BJP के 24 और JDS के छह सदस्य हैं। सदन में एक निर्दलीय सदस्य और सभापति भी हैं, जबकि सरकार की ओर से मनोनीत किए जाने वाले पांच सदस्यों की सीटें खाली हैं। इसलिए MLC चुनाव के नतीजों से राज्य सरकार की स्थिरता पर तत्काल बड़ा असर पड़ने की संभावना नहीं है। लेकिन राजनीतिक नुकसान केवल सदन में संख्या घटने से नहीं मापा जाता। चुनावी हार विपक्ष को सरकार की नीतियों, नेतृत्व और संगठन पर सवाल उठाने का अवसर देती है। BJP और JDS अब यह दावा कर सकते हैं कि कांग्रेस अपने ही शासन वाले राज्य में मतदाताओं के एक महत्वपूर्ण वर्ग का समर्थन हासिल नहीं कर सकी।
दूसरी ओर, कांग्रेस के लिए यह भी ध्यान देने वाली बात है कि विधान परिषद के चुनाव सीमित मतदाता समूहों के बीच हुए थे। इसलिए इन नतीजों से विधानसभा चुनाव का भविष्य तय मान लेना जल्दबाजी होगी। राज्यव्यापी जनसमर्थन का आकलन करने के लिए व्यापक चुनावी रुझानों और अन्य राजनीतिक संकेतों को भी देखना होगा।
सिद्धारमैया के बाद कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा सवाल क्या है?
कर्नाटक में नेतृत्व परिवर्तन के बाद कांग्रेस के सामने असली परीक्षा यह है कि वह अपनी पुरानी राजनीतिक ताकत को नए नेतृत्व के तहत कितनी प्रभावी ढंग से बनाए रखती है। सिद्धारमैया की सामाजिक और कल्याणकारी राजनीति से बनी पहचान को आगे बढ़ाना, संगठन को सक्रिय रखना और अलग-अलग सामाजिक समूहों के साथ संवाद बनाए रखना पार्टी के लिए महत्वपूर्ण होगा।
चार MLC सीटों पर हार यह संकेत देती है कि कांग्रेस को स्थानीय चुनावों में अपने प्रदर्शन की समीक्षा करनी चाहिए। लेकिन इसे सिद्धारमैया के जाने के बाद पार्टी के जनाधार के पूरी तरह खत्म होने का प्रमाण नहीं कहा जा सकता। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि BJP-JDS गठबंधन ने एक साथ चुनाव लड़कर चारों सीटें जीत लीं, जबकि कांग्रेस एक भी सीट हासिल नहीं कर सकी।
अब डीके शिवकुमार के नेतृत्व में कांग्रेस इस नतीजे से क्या सबक लेती है, यही आगे की राजनीति में अहम होगा। क्या पार्टी सिद्धारमैया के दौर में बने सामाजिक समीकरणों और अपनी गारंटी योजनाओं के राजनीतिक लाभ को कायम रख पाएगी, या विपक्ष स्थानीय चुनावों की ऐसी हार को बड़े राजनीतिक मुद्दे में बदलने में सफल होगा? इसका जवाब आने वाले चुनावों और राज्य में कांग्रेस के अगले कदमों से ही मिलेगा।
