
मिडिल ईस्ट का तापमान सिर्फ मौसम का नहीं, राजनीति का भी है। Syria, Israel, Iran, Iraq और फिलिस्तीन के बीच बढ़ता तनाव किसी बड़े टकराव का संकेत दे रहा है।
इसी पृष्ठभूमि में Narendra Modi 25 फरवरी से इजरायल की यात्रा पर जा रहे हैं। पहली नजर में यह timing चौंकाती है। लेकिन कूटनीति अक्सर वहीं कदम रखती है, जहां जोखिम ज्यादा हो।
दूसरा दौरा, पर अलग संदर्भ
प्रधानमंत्री के रूप में मोदी की यह दूसरी इजरायल यात्रा होगी। 2017 में उन्होंने इतिहास रचा था जब वह इजरायल जाने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने थे। इस बार संदर्भ बदला हुआ है। क्षेत्रीय समीकरण जटिल हैं और वैश्विक राजनीति में नई रेखाएं खिंच रही हैं।
Trump Factor और Regional Shockwaves
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने खुले तौर पर ईरान पर सैन्य विकल्प पर विचार की बात कही है। अगर ऐसा हुआ, तो इजरायल सीधे क्षेत्रीय संघर्ष के केंद्र में आ सकता है।
यही वह क्षण है जहां भारत की कूटनीति संतुलन साधती नजर आती है।
Netanyahu Equation
इजरायल के प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu की 2025 में प्रस्तावित भारत यात्रा तीन बार टल चुकी है। रणनीतिक मामलों के जानकार Brahma Chellaney का मानना है कि मोदी का यह दौरा प्रतीक्षा की राजनीति से आगे बढ़कर proactive diplomacy का संकेत है।

नई दिल्ली में हाल ही में अरब विदेश मंत्रियों की मेजबानी के बाद इजरायल जाना, भारत के संतुलित दृष्टिकोण का हिस्सा माना जा रहा है।
Defense, Tech और Bigger Chessboard
भारत और इजरायल के संबंध सिर्फ औपचारिक नहीं हैं। रक्षा तकनीक, साइबर सिक्योरिटी, कृषि नवाचार और स्टार्टअप सहयोग इस साझेदारी की रीढ़ हैं। यह दौरा सुनिश्चित करेगा कि महत्वपूर्ण रक्षा और टेक्नोलॉजी प्रोजेक्ट्स पटरी से न उतरें।
भारत का संदेश साफ है दिल्ली संवाद के दरवाजे बंद नहीं करती, बल्कि सभी दिशाओं में खोलती है।
Optics vs Strategy
संभावित युद्ध क्षेत्र की यात्रा करना तर्कहीन लग सकता है। लेकिन कभी-कभी कूटनीति का सबसे मजबूत बयान वही होता है, जो जोखिम के बीच दिया जाए। यह दौरा “पक्ष चुनने” से ज्यादा “संतुलन साधने” की कहानी है। मिडिल ईस्ट की आग में भारत खुद को फायरफाइटर नहीं, बल्कि स्थिर पुल की तरह पेश करना चाहता है।
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