परमाणु समझौते पर अमेरिका-ईरान में गतिरोध बरकरार, कतर की मध्यस्थता के बावजूद फंसी बातचीत; सीजफायर पर भी संकट

वॉशिंगटन/तेहरान: अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु समझौते को लेकर लंबे समय से चल रही बातचीत एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर पहुंचकर अटक गई है। दोनों देशों के बीच सहमति न बन पाने की वजह से न केवल परमाणु डील बल्कि क्षेत्रीय सीजफायर पर भी संकट के बादल मंडराने लगे हैं।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में दिए बयान में संकेत दिया है कि यदि समझौता नहीं होता है तो सीजफायर खत्म हो सकता है। वहीं मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार ट्रंप प्रशासन फिर से सैन्य कार्रवाई के विकल्प पर विचार कर रहा है।

इसके विपरीत ईरान ने साफ कर दिया है कि युद्ध किसी भी स्थिति में विकल्प नहीं है और वह केवल संतुलित समझौते के पक्ष में है।

कतर के जरिए डिप्लोमैटिक बैकचैनल एक्टिव

इसी बीच अमेरिका ने बातचीत को आगे बढ़ाने के लिए कतर को बैकडोर डिप्लोमैटिक चैनल के तौर पर सक्रिय किया है। कतर को अंतरराष्ट्रीय विवादों में मध्यस्थता के लिए जाना जाता है और इस प्रक्रिया में उसके प्रधानमंत्री अल-थानी को भी शामिल किया गया है।

कहां फंसी है असली डील?

परमाणु समझौते पर गतिरोध की तीन प्रमुख वजहें सामने आ रही हैं—

1. भरोसे का संकट सबसे बड़ी बाधा
ईरान का कहना है कि उसे अमेरिका पर भरोसा नहीं है। ईरान संसद के स्पीकर एमबी गालिबफ ने साफ कहा है कि जब तक अमेरिका की ओर से ठोस गारंटी नहीं मिलती, तब तक समझौता संभव नहीं है। चीन में ईरान के राजदूत ने भी कहा है कि यदि कोई मजबूत अंतरराष्ट्रीय गारंटर यह सुनिश्चित करता है कि भविष्य में अमेरिका हमला नहीं करेगा, तभी आगे बात बढ़ सकती है।

2. यूरेनियम संवर्धन पर टकराव
ईरान ने अपने यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम को पूरी तरह खत्म करने से इनकार कर दिया है। ईरानी प्रवक्ता के अनुसार, समझौता अमेरिका की शर्तों पर नहीं हो सकता। हालांकि कुछ रिपोर्टों में यह भी दावा किया गया है कि ईरान संवर्धन घटाने को तैयार है, लेकिन अपने वैज्ञानिक ठिकानों को नष्ट नहीं करेगा क्योंकि इसे वह अपनी संप्रभुता का मुद्दा मानता है।

3. समझौते की अवधि और मुआवजे की मांग
अमेरिका ने प्रस्ताव दिया है कि ईरान को 20 वर्षों तक परमाणु संवर्धन पर प्रतिबंध स्वीकार करना होगा। ईरान ने इसे अस्वीकार करते हुए केवल 10 वर्षों की सीमा पर सहमति जताई है।

इसके अलावा ईरान ने यह भी मांग रखी है कि अमेरिका द्वारा उसके परमाणु ठिकानों पर किए गए हमलों के लिए कम से कम 200 अरब डॉलर का मुआवजा दिया जाए।

ट्रंप का बयान और बढ़ा तनाव

डोनाल्ड ट्रंप ने आरोप लगाया कि ईरान के भीतर उदारवादी और कट्टरपंथी अलग-अलग दिशा में बातचीत कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें पहले बताया गया था कि ईरान न्यूक्लियर कार्यक्रम को खत्म करने को तैयार है, लेकिन अब रुख बदल गया है।

ट्रंप ने सख्त लहजे में कहा कि उनका एकमात्र लक्ष्य यह है कि ईरान किसी भी हाल में परमाणु हथियार विकसित न करे।

अमेरिकी सुरक्षा विशेषज्ञों की चेतावनी

पूर्व अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन ने कहा है कि ईरान के कट्टरपंथी समझौते के पक्ष में नहीं हैं और वे ऐसा कोई भी समझौता नहीं चाहते जिसे ट्रंप अपनी राजनीतिक जीत के रूप में पेश कर सकें। उन्होंने यहां तक संकेत दिया कि मौजूदा स्थिति में सैन्य कार्रवाई एक संभावित विकल्प बन सकती है।

स्थिति यह है कि कूटनीतिक कोशिशों के बावजूद दोनों देशों के बीच भरोसे की खाई, परमाणु कार्यक्रम और सुरक्षा गारंटी जैसे मुद्दों पर कोई सहमति नहीं बन पा रही है, जिससे पूरा समझौता अधर में लटका हुआ है।

 

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