नई दिल्ली: साल 2024 के लोकसभा चुनावों के बाद जब राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई थी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का प्रभाव अब कमजोर पड़ने लगा है, तब शायद ही किसी ने कल्पना की होगी कि कुछ ही वर्षों में वह पहले से कहीं ज्यादा मजबूत राजनीतिक स्थिति में लौटेंगे। अब अंतरराष्ट्रीय विश्लेषणों और हालिया चुनावी नतीजों ने संकेत दे दिए हैं कि मोदी का राजनीतिक प्रभाव सिर्फ 2029 तक ही सीमित नहीं रहने वाला, बल्कि आने वाले दशक में भी भारतीय राजनीति के केंद्र में बना रह सकता है।
ब्लूमबर्ग की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक पश्चिम बंगाल में मिली ऐतिहासिक सफलता और दक्षिण भारत में तेजी से बदलते राजनीतिक समीकरणों ने भाजपा को नई मजबूती दी है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि प्रधानमंत्री मोदी 2029 में बड़े बहुमत के साथ वापसी की ओर बढ़ रहे हैं और 2030 के दशक के उत्तरार्ध तक भी सत्ता के शीर्ष पर बने रहने की तैयारी कर चुके हैं।
उत्तर भारत से आगे बढ़ी भाजपा की रणनीति
75 वर्षीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुनावी रणनीति अब केवल हिंदी भाषी राज्यों तक सीमित नहीं रह गई है। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के लंबे राजनीतिक वर्चस्व को चुनौती देने के साथ-साथ भाजपा ने तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों में भी अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज करानी शुरू कर दी है। इससे विपक्षी दलों की राजनीतिक जमीन लगातार कमजोर होती दिखाई दे रही है।
राजनीतिक विश्लेषणों के मुताबिक भाजपा ने 2014 में जिस हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण और एकीकरण की रणनीति पर काम शुरू किया था, वह अब पहले से अधिक प्रभावी रूप ले चुकी है। धार्मिक पहचान, राष्ट्रीय सुरक्षा और जनकल्याणकारी योजनाओं के मिश्रण ने जातिगत राजनीति की पारंपरिक धारा को पीछे धकेल दिया है।
राजनीतिक विश्लेषक माइकल कुगेलमैन का मानना है कि मौजूदा परिस्थितियों में भाजपा लगातार चौथी बार केंद्र की सत्ता में लौटने की सबसे मजबूत दावेदार बन चुकी है।
बंगाल की जीत ने बदली राष्ट्रीय राजनीति की दिशा
पश्चिम बंगाल में भाजपा का तीन सीटों से बढ़कर 207 सीटों तक पहुंचना पार्टी के लिए बड़ी राजनीतिक उपलब्धि माना जा रहा है। विश्लेषकों का कहना है कि मजबूत संगठन, आक्रामक चुनावी रणनीति और ध्रुवीकरण की राजनीति ने विपक्ष के लिए चुनौती और कठिन बना दी है।
वहीं दूसरी तरफ विपक्षी दलों के बीच नेतृत्व संकट और आपसी मतभेद भी भाजपा के लिए बड़ा राजनीतिक लाभ साबित हो रहे हैं। कई राजनीतिक जानकार मानते हैं कि फिलहाल विपक्ष के पास ऐसा कोई साझा चेहरा नहीं है जो राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा को सीधी चुनौती दे सके।
आर्थिक चुनौतियों के बीच भी कायम राजनीतिक पकड़
ईरान युद्ध के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में बढ़ोतरी और महंगाई जैसे दबावों के बावजूद प्रधानमंत्री मोदी की राजनीतिक स्थिति मजबूत बनी हुई है। यही वजह है कि सरकार को बड़े आर्थिक फैसले लेने में अपेाकृत अधिक राजनीतिक समर्थन मिल रहा है।
सरकार ने देश को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने का लक्ष्य तय किया है। इसी दिशा में वैश्विक कंपनियों को भारत में निवेश के लिए आकर्षित करने और श्रम कानूनों को सरल बनाने जैसे कदम उठाए जा रहे हैं। एपल जैसी बड़ी कंपनियों की भारत में बढ़ती मौजूदगी को भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
वैचारिक एजेंडे को मिली नई ताकत
हालिया राजनीतिक सफलता ने भाजपा को अपने वैचारिक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए नया आत्मविश्वास दिया है। ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ और ‘समान नागरिक संहिता’ जैसे मुद्दों पर सरकार अब पहले से अधिक आक्रामक रुख अपना सकती है।
हालांकि राज्यसभा में संख्याबल और अल्पसंख्यक समुदायों के विरोध जैसी चुनौतियां अब भी मौजूद हैं, लेकिन विपक्ष की बिखरी हुई स्थिति भाजपा के लिए राहत का कारण बनी हुई है। पूर्व सांसद कपिल सिब्बल और हन्नान मुल्ला समेत कई विपक्षी नेताओं की चिंताएं भी इस बात की ओर संकेत करती हैं कि वर्तमान समय में भाजपा को राष्ट्रीय स्तर पर चुनौती देने वाला कोई मजबूत नेतृत्व उभरता नजर नहीं आ रहा।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि भाजपा के भीतर आंतरिक गुटबाजी जैसी स्थिति पैदा नहीं होती, तो प्रधानमंत्री मोदी का राजनीतिक विजय अभियान 2030 के दशक के अंत तक भी जारी रह सकता है।
