
Uttar Pradesh में स्मार्ट प्रीपेड मीटर योजना अब सिर्फ बिजली विभाग की तकनीकी समस्या नहीं रही, बल्कि सरकार के लिए बड़ा राजनीतिक संकट बन चुकी है। जनता का गुस्सा इतना बढ़ गया कि सरकार को अपना फैसला पलटना पड़ा। अब सियासी गलियारों में चर्चा इस बात की है कि इस पूरे विवाद की सबसे बड़ी कीमत ऊर्जा मंत्री A. K. Sharma को चुकानी पड़ सकती है। सूत्रों के मुताबिक आगामी मंत्रिमंडल विस्तार में उनका विभाग बदला जा सकता है।
जिस योजना को ‘स्मार्ट’ बताया गया, वही बना मुसीबत
सरकार ने स्मार्ट प्रीपेड मीटर योजना को बिजली व्यवस्था में सुधार और पारदर्शिता लाने के उद्देश्य से लागू किया था। लेकिन जमीनी स्तर पर हालात पूरी तरह उलट निकले। विभागीय अव्यवस्था, तकनीकी खामियों और कमजोर शिकायत प्रणाली ने इस योजना को जनता के लिए सिरदर्द बना दिया।
सबसे बड़ा विवाद तब खड़ा हुआ जब करीब 82 लाख पोस्टपेड स्मार्ट मीटरों को बिना उपभोक्ताओं की सहमति के अचानक प्रीपेड में बदल दिया गया। लोगों को लगा कि सरकार उनकी मर्जी के बिना उनके घरों की बिजली व्यवस्था बदल रही है।
5 लाख घरों की बिजली गुल, जनता सड़कों पर
स्थिति तब और बिगड़ी जब तकनीकी गड़बड़ियों के कारण करीब 5 लाख घरों की बिजली ‘नेगेटिव बैलेंस’ दिखाकर काट दी गई। कई उपभोक्ताओं ने आरोप लगाया कि रिचार्ज करने के बाद भी घंटों बिजली बहाल नहीं हुई।
Lucknow से लेकर Varanasi, Agra और Mathura तक विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। महिलाओं ने सार्वजनिक तौर पर मीटर उखाड़कर प्रदर्शन किए, जिसके वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुए।
‘स्मार्ट चीटर’ बना सोशल मीडिया का सबसे बड़ा तंज
सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो सामने आने लगे जिनमें बिना अधिक लोड के भी मीटर तेज चलते दिखाई दिए। विरोधियों ने इन्हें “स्मार्ट मीटर” नहीं बल्कि “स्मार्ट चीटर” कहना शुरू कर दिया।
सरकार और विभाग इस धारणा को तोड़ने में पूरी तरह नाकाम रहे। जनता के बीच यह विश्वास बन गया कि मीटर गलत रीडिंग दिखा रहे हैं और ज्यादा बिल निकाल रहे हैं।
शिकायतें बंद, उपभोक्ता परेशान
लोगों का आरोप था कि हेल्पलाइन 1912 पर शिकायत दर्ज कराने के बावजूद समस्याओं का समाधान नहीं हो रहा था। कई मामलों में शिकायतें बिना कार्रवाई के बंद कर दी गईं। यानी जनता के पास न बिजली थी, न सुनवाई। यही वजह रही कि गुस्सा धीरे-धीरे आंदोलन में बदल गया।
सोलर उपभोक्ताओं का भी फूटा गुस्सा
सोलर पैनल लगाने वाले उपभोक्ताओं ने भी योजना पर सवाल उठाए। आरोप लगा कि नेट मीटर हटाकर प्रीपेड मीटर लगाए गए, जिससे उन्हें मिलने वाली सब्सिडी और बिलिंग लाभ प्रभावित हुए। इस फैसले ने मध्यम वर्ग और जागरूक उपभोक्ताओं को भी सरकार के खिलाफ खड़ा कर दिया।
RSS और भाजपा संगठन के फीडबैक से बदली हवा
शुरुआत में प्रशासनिक अधिकारियों ने सरकार को भरोसा दिलाया कि विरोध सीमित है। लेकिन जब भाजपा विधायकों और स्थानीय नेताओं की रिपोर्ट आने लगी, तब मामला गंभीर हो गया। Rashtriya Swayamsevak Sangh और भाजपा संगठन को लगातार फीडबैक मिल रहा था कि जनता इस मुद्दे पर बेहद नाराज है और इसका असर चुनावों पर पड़ सकता है। बताया जा रहा है कि यही फीडबैक सरकार के यू-टर्न की सबसे बड़ी वजह बना।
विपक्ष ने मौके को तुरंत भुनाया
सपा अध्यक्ष Akhilesh Yadav ने स्मार्ट मीटर की तुलना EVM से करते हुए इसे “लूट का जरिया” बताया और 300 यूनिट मुफ्त बिजली का वादा दोहराया। वहीं आप सांसद Sanjay Singh ने तंज कसते हुए कहा कि ये मीटर “मिल्खा सिंह से भी तेज भागते हैं।” विपक्ष ने जनता के गुस्से को तुरंत राजनीतिक मुद्दे में बदल दिया।
चुनाव नतीजों के बाद सरकार का अचानक यू-टर्न
4 मई को पांच राज्यों के चुनाव नतीजे आने के बाद यूपी की राजनीति में हलचल तेज हो गई। उसी दिन A. K. Sharma ने शक्ति भवन पहुंचकर प्रीपेड सिस्टम खत्म करने की घोषणा कर दी। उन्होंने “उपभोक्ता देवो भव:” का नारा देते हुए बकाया बिल किस्तों में जमा करने की सुविधा का भी ऐलान किया। लेकिन तब तक राजनीतिक नुकसान की चर्चा शुरू हो चुकी थी।
अब सवाल मंत्री की कुर्सी पर
तकनीकी विफलता, जनता का गुस्सा और संगठन के निगेटिव फीडबैक ने ऊर्जा मंत्री की स्थिति कमजोर कर दी है। अब राजनीतिक गलियारों में यही चर्चा है कि आगामी मंत्रिमंडल फेरबदल में बड़ा फैसला लिया जा सकता है।
स्मार्ट प्रीपेड मीटर योजना ने यह साबित कर दिया कि तकनीकी फैसले अगर जनता की सुविधा से ज्यादा बोझ बन जाएं, तो वही योजना सरकार के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक संकट बन सकती है। अब निगाहें सिर्फ स्मार्ट मीटर पर नहीं, बल्कि योगी सरकार के अगले राजनीतिक कदम पर टिकी हैं।
