राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने लखनऊ में आयोजित प्रमुख जन गोष्ठी में कहा कि मंदिरों की आय का बड़ा हिस्सा जनकल्याण में लगाया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि मंदिरों की बागडोर सरकार के बजाय जिम्मेदार भक्तों के हाथों में होनी चाहिए। बात सुनने में appealing है धर्मस्थल समाज के लिए हों, सिर्फ संरचना के लिए नहीं। लेकिन असली चर्चा यहीं से शुरू होती है। “हिंदू समाज को जगाना” कैसे? एक सवाल के जवाब में भागवत ने कहा कि संघ की सबसे बड़ी चुनौती…
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धर्मपरायण vs. धर्मांधता: फर्क जान लीजिए, बाद में मत कहना बताया नहीं!
मित्रों, ज्ञान एक मुफ्त चीज़ है— बस दिमाग का थोड़ा सा स्पेस चाहिए। इसी स्पेस की कमी के कारण लोग धर्मपरायण (भावना) और धर्मांधता (अंधभावना) को एक ही समझ लेते हैं। और फिर बोलते हैं— “किसी ने बताया ही नहीं।” तो आज सुन लीजिए, समझ लीजिए… और सेव करके रखिए। 1. धर्मपरायणता क्या है? – Faith with Logic धर्मपरायण होना मतलब— ईश्वर में विश्वास रखना, सदाचार, करुणा, संयम, सेवा जैसे मूल्यों का पालन करना। तर्क और अध्यात्म दोनों को साथ लेकर चलना। ये वही लोग होते हैं जो पूजा भी…
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