नई दिल्ली: राज्यसभा जाने की चर्चाओं में बार-बार नाम आने के बाद भी कवि कुमार विश्वास के हिस्से में इस बार भी टिकट नहीं आया। उत्तर प्रदेश से राज्यसभा की 8 सीटों के लिए बीजेपी ने उम्मीदवारों का ऐलान कर दिया, लेकिन इस सूची में कुमार विश्वास का नाम नहीं है। दिलचस्प बात यह है कि टिकट की रेस शुरू होते ही जिन चर्चित नामों की चर्चा हुई, उनमें कुमार विश्वास का नाम भी प्रमुखता से सामने आया था।
हर बार चर्चा में आते हैं कुमार विश्वास, फिर रह जाता है नाम
कुमार विश्वास के राज्यसभा जाने की चर्चा कोई पहली बार नहीं है। इस बार भी यूपी बीजेपी की ओर से केंद्रीय नेतृत्व को भेजे गए संभावित नामों के पैनल में उनका नाम शामिल बताया गया था। इससे पहले भी राज्यसभा चुनाव के दौरान उनके नाम पर चर्चा हो चुकी है, लेकिन अंतिम सूची में जगह नहीं बनी।
यानी कहानी कुछ ऐसी बन गई है कि राज्यसभा की दौड़ शुरू होते ही कुमार विश्वास का नाम सुर्खियों में आता है और जब टिकट की अंतिम सूची सामने आती है तो कवि जी का नाम फिर गायब मिलता है।
इस बार भी ‘कुमार’ वाली उम्मीद पर नहीं लगी मुहर
बीजेपी ने यूपी से धर्मपाल सिंह, राधाकांत ओझा, प्रकाश पाल, विद्यासागर सोनकर, गोपी कृष्ण पांडे, प्रियंका सिंह रावत, राम प्रताप सिंह चौहान और श्रुति गंगवार को उम्मीदवार बनाया है। सूची में कुमार विश्वास के अलावा स्मृति ईरानी और हरदीप सिंह पुरी जैसे चर्चित नाम भी नहीं हैं।
तो आखिर बार-बार क्यों फिसल रहा टिकट?
इसका सीधा जवाब पार्टी ने सार्वजनिक तौर पर नहीं दिया है। हालांकि, रिपोर्टों के मुताबिक इस बार उम्मीदवारों के चयन में 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए संगठन और सामाजिक समीकरणों को महत्व दिया गया। बीजेपी की अंतिम सूची में जमीनी और संगठन से जुड़े कई नेताओं को जगह मिली है।
यही वजह है कि कुमार विश्वास का नाम चर्चा में आने के बावजूद अंतिम सूची तक नहीं पहुंच पाया। हालांकि उनके नाम पर चर्चा होना यह जरूर बताता है कि राज्यसभा की संभावित सूची में उनका नाम लगातार राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है।
कवि के लिए राज्यसभा अब भी दूर की ‘मंजिल’
कुमार विश्वास के लिए फिलहाल राज्यसभा की कहानी कुछ ऐसी है—नाम पैनल में आता है, चर्चाओं का बाजार गर्म होता है, अटकलें तेज होती हैं और फिर अंतिम सूची आते ही उम्मीदों पर विराम लग जाता है।
अब ऐसे में कुमार विश्वास की अपनी ही पंक्तियां याद आना लाजिमी है—
‘मैं तुझसे दूर कैसा हूं, तू मुझसे दूर कैसी है…’
फर्क बस इतना है कि यहां सवाल दिल का नहीं, राज्यसभा के टिकट का है!
