नई दिल्ली: देशभर में बढ़ते डॉग बाइट मामलों के बीच सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों को लेकर बड़ा और अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने डॉग लवर्स की याचिकाएं खारिज करते हुए नवंबर 2025 में जारी गाइडलाइन और मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) को बरकरार रखा है। कोर्ट ने साफ कहा कि बच्चों और महिलाओं पर कुत्तों के हमलों की घटनाओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में माना कि देश में आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या अब गंभीर चिंता का विषय बन चुकी है। अदालत ने कहा कि 2001 में लागू किए गए एबीसी नियमों के बावजूद हालात में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ और राज्यों ने इस दिशा में पर्याप्त और दूरगामी कदम नहीं उठाए।
सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन की बड़ी बातें
अदालत ने कहा कि आवारा कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण अनिवार्य होगा। नगर निगम और स्थानीय निकायों को कुत्तों को पकड़कर स्टरलाइजेशन और वैक्सीनेशन का काम करना होगा।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि सामान्य और स्वस्थ कुत्तों को नसबंदी और टीकाकरण के बाद उसी क्षेत्र में छोड़ा जाए, जहां से उन्हें पकड़ा गया था। हालांकि, खूंखार और रेबीज संक्रमित कुत्तों को वापस नहीं छोड़ा जाएगा। ऐसे कुत्तों को विशेष शेल्टर होम में रखा जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि खतरनाक व्यवहार वाले और संक्रमित कुत्तों के लिए अलग शेल्टर होम बनाए जाएं।
सड़क और गलियों में खाना खिलाने पर रोक
फैसले में अदालत ने खुली जगहों, गलियों और सड़कों पर आवारा कुत्तों को खाना खिलाने पर रोक लगाने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने कहा कि इसके लिए अलग-अलग फीडिंग जोन बनाए जाएं, जहां उचित व्यवस्था और सूचना बोर्ड लगाए जाएं।
इसके साथ ही स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, बस अड्डा, रेलवे स्टेशन और खेल परिसरों जैसे सार्वजनिक स्थानों से आवारा कुत्तों को हटाने के निर्देश भी दिए गए हैं।
राष्ट्रीय स्तर पर बनेगी एक समान नीति
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को आवारा कुत्तों के प्रबंधन के लिए राष्ट्रीय नीति तैयार करने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि सभी राज्यों में एक समान व्यवस्था लागू होनी चाहिए और एबीसी फ्रेमवर्क को प्रभावी तरीके से लागू किया जाए।
ABC फ्रेमवर्क पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी
अदालत ने कहा कि एबीसी फ्रेमवर्क लागू हुए 25 साल हो चुके हैं, लेकिन आवारा कुत्तों की आबादी के अनुपात में संसाधन नहीं बढ़ाए गए। कोर्ट ने माना कि बिना ठोस योजना के नसबंदी और वैक्सीनेशन अभियान चलाए गए, जिसकी वजह से समस्या और गंभीर होती गई।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर राज्य सरकारें समय रहते प्रभावी कदम उठातीं, तो हालात इतने चिंताजनक नहीं होते।
राजस्थान और तमिलनाडु के आंकड़ों का जिक्र
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने डॉग बाइट के बढ़ते मामलों पर चिंता जताते हुए राजस्थान और तमिलनाडु का उदाहरण दिया। अदालत ने कहा कि राजस्थान के श्रीगंगानगर में 30 दिनों के भीतर डॉग बाइट के 1084 मामले सामने आए। इनमें कई बच्चों को गंभीर चोटें आईं और चेहरे पर हमले जैसी भयावह घटनाएं भी दर्ज हुईं। वहीं तमिलनाडु में चार महीनों के भीतर दो लाख से ज्यादा डॉग बाइट के मामले सामने आने का भी जिक्र किया गया।
