क्या ‘सांसद पति’ मॉडल बनेगा नया ट्रेंड या बदलेगी राजनीति?

आशीष शर्मा (ऋषि भारद्वाज)
आशीष शर्मा (ऋषि)

भारत की राजनीति में एक बड़ा “रिफॉर्म पैकेज” लॉन्च हो चुका है—नाम है नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023। सुनने में ऐसा लगता है जैसे अब संसद और विधानसभाओं में “लेडीज़ स्पेशल कोच” खुलने वाला है। लेकिन असली सवाल ये है—क्या सच में महिलाएं सशक्त होंगी या फिर ‘रिमोट कंट्रोल’ अब भी वही पुराने हाथों में रहेगा?

आंकड़ों की सच्चाई: Representation का रियलिटी चेक

अगर आंकड़ों की भाषा में बात करें तो भारत अभी भी महिला प्रतिनिधित्व के मामले में “लो बैटरी मोड” पर चल रहा है। लोकसभा में महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 14-15% और राज्य विधानसभाओं में तो कई जगह 10% से भी कम है।

मतलब साफ है—वोट देने में महिलाएं बराबरी कर रही हैं, लेकिन टिकट देने में पार्टियां अभी भी “सेलेक्टिव विजन” से काम ले रही हैं।

पार्टी सिस्टम: जहां ‘एंट्री’ अभी भी लिमिटेड एडिशन है

राजनीतिक दलों के अंदर झांकिए तो तस्वीर और दिलचस्प हो जाती है। यहां महिलाओं की हिस्सेदारी 10-15% के आसपास ही घूमती रहती है। यानि पार्टी ऑफिस में जगह कम, लेकिन चुनाव आते ही “33% सीट रिजर्व” का टारगेट! सीधे शब्दों में—“टीम में जगह नहीं, लेकिन मैच खेलने भेजना है।”

पंचायत मॉडल: जहां ‘सरपंच’ कम, ‘सरपंच पति’ ज्यादा दिखे

गांव की राजनीति इस कहानी का ट्रेलर पहले ही दिखा चुकी है। पंचायतों में महिलाओं को आरक्षण मिला, लेकिन कई जगह असली फैसले “सरपंच पति” लेते नजर आए।

अब सवाल ये है—क्या वही मॉडल अपग्रेड होकर “MLA पति” और “MP पति” वर्जन में लॉन्च होगा?

क्या महिलाएं तैयार नहीं हैं? या सिस्टम तैयार नहीं है?

ये कहना आसान है कि महिलाएं राजनीति के लिए तैयार नहीं हैं। लेकिन सच्चाई ये है कि उन्हें मौका ही कम मिला है। जब-जब मौका मिला है—महिलाओं ने साबित किया है कि वो सिर्फ “फेस वैल्यू” नहीं, बल्कि “डिसीजन मेकर” भी बन सकती हैं। समस्या टैलेंट की नहीं, गेटकीपिंग की है।

तीन चरणों में बदलेगा खेल: धीरे-धीरे होगा ‘पावर शिफ्ट’

इस कानून का असर कोई इंस्टेंट नूडल्स नहीं है—यह एक “स्लो कुकिंग पॉलिटिकल प्रोसेस” है:

  1. पहला चरण: परिवार आधारित उम्मीदवार—“सेफ बेट” पॉलिटिक्स
  2. दूसरा चरण: कुछ महिलाएं खुद फैसले लेने लगेंगी
  3. तीसरा चरण: असली महिला नेतृत्व का उदय

यानि शुरुआत भले “रिमोट कंट्रोल” से हो, लेकिन अंत में “सेल्फ ड्राइव मोड” भी आ सकता है।

राजनीतिक दलों की असली परीक्षा अब शुरू

अगर पार्टियां सच में बदलाव चाहती हैं, तो उन्हें सिर्फ सीट नहीं—सिस्टम बदलना होगा। महिला विंग को सिर्फ “फोटो ऑप” से निकालकर निर्णय प्रक्रिया में लाना होगा। वरना ये कानून भी “फाइल में पास, जमीन पर फेल” बन सकता है।

समाज का रोल: घर से संसद तक का सफर

राजनीति समाज का आईना है। अगर घर में महिला की आवाज दबेगी, तो संसद में भी वही इको सुनाई देगी। शिक्षा, आर्थिक स्वतंत्रता और सामाजिक स्वीकार्यता—ये तीनों ही असली “पावर बूस्टर” हैं।

‘प्रॉक्सी’ से ‘पावर’ तक का सफर

नारी शक्ति वंदन अधिनियम कोई जादू की छड़ी नहीं है। शुरुआत में “सांसद पति” जैसे मीम्स ट्रेंड करेंगे, ये तय है। लेकिन इतिहास कहता है पहले अधिकार मिलता है, फिर उसका असली इस्तेमाल सीखते हैं।

तो ये अंत नहीं, बल्कि एक “पॉलिटिकल रिवोल्यूशन का ट्रेलर” है। अब देखना ये है कि ये फिल्म सुपरहिट होती है या फिर सिर्फ पोस्टर तक सीमित रह जाती है।

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