नई दिल्ली: भारतीय सिनेमा की दिग्गज अभिनेत्री स्मिता पाटिल की जिंदगी भले ही महज 31 साल की उम्र में थम गई, लेकिन उनकी अदाकारी, संवेदनशीलता और दमदार किरदार आज भी लोगों के दिलों में जिंदा हैं। पर्दे पर अपनी आंखों और भावों से किरदारों में जान डाल देने वाली स्मिता पाटिल की 71वीं जयंती पर अभिनेता राज बब्बर ने उन्हें भावुक अंदाज में याद किया। राज ने सोशल मीडिया पर स्मिता की तस्वीर साझा करते हुए उनके असाधारण अभिनय, स्नेह भरे स्वभाव और भारतीय सिनेमा में उनके योगदान को याद किया। उनका संदेश इस बात का अहसास कराता है कि स्मिता के जाने के करीब चार दशक बाद भी उनकी कमी उनके करीबियों के लिए कितनी गहरी है।
राज बब्बर ने अपने संदेश में स्मिता पाटिल को एक बेहद संवेदनशील कलाकार बताया। उन्होंने लिखा कि स्मिता का जीवन भले ही छोटा रहा, लेकिन उनकी कला ने ऐसी छाप छोड़ी, जो कभी मिट नहीं सकती। वह केवल पर्दे पर किरदार नहीं निभाती थीं, बल्कि अपने अभिनय से उनमें जान डाल देती थीं। राज ने लिखा कि उन्हें स्मिता की बहुत याद आती है। उनके स्नेह, असाधारण प्रतिभा और उन तमाम खूबियों को याद करते हुए राज ने कहा कि स्मिता की विरासत आज भी लोगों को प्रेरित करती है और आने वाली पीढ़ियों पर अपना प्रभाव छोड़ रही है।
राज बब्बर ने यह भी कहा कि कलाकार भले ही इस दुनिया से चले जाते हैं, लेकिन जिन लोगों के जीवन को वे छू जाते हैं, उनके दिलों में हमेशा मौजूद रहते हैं। स्मिता पाटिल की जयंती पर उनका यह संदेश अभिनेत्री के व्यक्तित्व और उनकी यादों से जुड़े भावनात्मक पहलू को सामने लाता है।

दूरदर्शन पर मराठी समाचार पढ़ने से शुरू हुआ था सफर
फिल्मी दुनिया में कदम रखने से पहले स्मिता पाटिल मुंबई के दूरदर्शन केंद्र पर मराठी भाषा में समाचार पढ़ा करती थीं। उस दौर में समाचार पढ़ने के लिए साड़ी पहनना जरूरी होता था, जबकि स्मिता को जींस पहनना पसंद था। उनसे जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा यह भी है कि वह कई बार जींस के ऊपर ही साड़ी लपेटकर समाचार पढ़ने पहुंच जाती थीं। पर्दे पर गंभीर और संजीदा नजर आने वाली स्मिता असल जिंदगी में शरारती और सहज स्वभाव की थीं।
उनकी प्रतिभा पर फिल्मकार श्याम बेनेगल की नजर पड़ी। उन्होंने स्मिता को अभिनय की दुनिया में आने के लिए प्रोत्साहित किया। इसके बाद स्मिता ने फिल्मों का रुख किया और जल्द ही अपनी अलग पहचान बना ली। उन्होंने महज एक अभिनेत्री के तौर पर नहीं, बल्कि ऐसी कलाकार के रूप में जगह बनाई, जो अपने किरदारों के जरिए समाज, महिलाओं की स्थिति और मानवीय संवेदनाओं को प्रभावशाली ढंग से पर्दे पर उतार सकती थीं।
स्मिता ने अपने छोटे से फिल्मी करियर में समानांतर सिनेमा के कई दिग्गज निर्देशकों के साथ काम किया। श्याम बेनेगल, गोविंद निहलाणी, सत्यजीत रे और मृणाल सेन जैसे फिल्मकारों के साथ उनका जुड़ाव उनके अभिनय की विविधता को दर्शाता है। उन्होंने ऐसे किरदार चुने, जिनमें महिलाओं के संघर्ष, सामाजिक बदलाव और जिंदगी की जटिलताओं को जगह मिलती थी।
‘भूमिका’ से ‘मिर्च मसाला’ तक, हर किरदार में दिखाई अलग छाप
स्मिता पाटिल की पहचान ऐसी अभिनेत्री के रूप में बनी, जिन्होंने गंभीर और चुनौतीपूर्ण भूमिकाओं को अपनी ताकत बनाया। ‘भूमिका’, ‘मंथन’, ‘मिर्च मसाला’, ‘अर्थ’, ‘मंडी’, ‘निशांत’, ‘आक्रोश’ और ‘चक्र’ जैसी फिल्मों में उनके अभिनय को खास पहचान मिली। इन फिल्मों में उन्होंने अलग-अलग परिस्थितियों से जूझती महिलाओं के जीवन और भावनाओं को पर्दे पर उतारा।
उनकी खासियत यह थी कि वह किरदार को केवल संवादों तक सीमित नहीं रखती थीं। उनके चेहरे के भाव, आंखों की भाषा और अभिनय की सहजता किरदार को विश्वसनीय बना देती थी। यही वजह है कि कम समय में ही वह भारतीय समानांतर सिनेमा के प्रमुख चेहरों में शामिल हो गईं। उनकी फिल्मों ने उन्हें ऐसी अभिनेत्री के रूप में स्थापित किया, जिनका काम मनोरंजन के साथ सामाजिक सवालों को भी सामने लाता था।
स्मिता ने केवल कलात्मक फिल्मों में ही अपनी प्रतिभा नहीं दिखाई, बल्कि व्यावसायिक सिनेमा में भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। अमिताभ बच्चन के साथ उनकी फिल्म ‘नमक हलाल’ काफी चर्चित रही। इसके अलावा ‘शक्ति’ जैसी फिल्म में भी उन्होंने काम किया। गंभीर अभिनय के लिए पहचानी जाने वाली स्मिता का व्यावसायिक फिल्मों में नजर आना उनके अभिनय के अलग-अलग रंगों को दिखाता है।
उनकी उपलब्धियां भी उनके शानदार करियर की गवाही देती हैं। स्मिता पाटिल को फिल्म ‘भूमिका’ के लिए पहला राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। अपने करियर में उन्होंने दो बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार हासिल किया। उन्हें फिल्मफेयर पुरस्कारों से भी सम्मानित किया गया और निधन से एक साल पहले पद्मश्री से नवाजा गया। इतने कम समय में ये उपलब्धियां हासिल करना उनकी प्रतिभा और अभिनय क्षमता को दर्शाता है।

‘आज रपट जाएं’ की शूटिंग के बाद भावुक हो गई थीं स्मिता
स्मिता पाटिल की जिंदगी से जुड़े कई ऐसे किस्से हैं, जो उनके व्यक्तित्व के अलग-अलग पहलुओं को सामने लाते हैं। अमिताभ बच्चन के साथ फिल्म ‘नमक हलाल’ का गीत ‘आज रपट जाएं’ भी ऐसा ही एक प्रसंग है। गंभीर और संजीदा भूमिकाओं के लिए मशहूर स्मिता के लिए इस गाने की शूटिंग एक अलग अनुभव थी। रिपोर्टों के मुताबिक, इस गीत की शूटिंग के बाद वह भावुक होकर रो पड़ी थीं। बताया जाता है कि अगले दिन अमिताभ बच्चन ने उनसे बात की और समझाया कि फिल्म की कहानी के लिहाज से उस दृश्य की जरूरत थी।
यह किस्सा स्मिता के अभिनय के प्रति उनके दृष्टिकोण को भी सामने लाता है। वह अपने किरदारों को लेकर बेहद गंभीर रहती थीं और पर्दे पर किसी भूमिका को निभाते समय उसके भावनात्मक पहलुओं को महत्व देती थीं। यही संवेदनशीलता उनके अभिनय की सबसे बड़ी पहचान बनी।
अमिताभ बच्चन से जुड़ा एक अन्य किस्सा भी चर्चा में रहा है। बताया जाता है कि फिल्म ‘कुली’ की शूटिंग के दौरान अमिताभ बच्चन बेंगलुरु में थे। एक रात स्मिता ने उन्हें फोन किया और उनकी तबीयत के बारे में पूछा। उन्होंने बताया कि उन्हें सपना आया था कि अमिताभ को शूटिंग के दौरान चोट लगी है। इसके अगले दिन फिल्म की शूटिंग के समय अमिताभ घायल हो गए थे। इस घटना का जिक्र स्मिता के जीवन से जुड़े किस्सों में अक्सर किया जाता है।
‘भीगी पलकें’ के सेट पर हुई थी राज बब्बर से मुलाकात
स्मिता पाटिल की निजी जिंदगी भी लंबे समय तक चर्चा में रही। राज बब्बर और स्मिता की पहली मुलाकात 1982 में फिल्म ‘भीगी पलकें’ के सेट पर हुई थी। साथ काम करने के दौरान दोनों करीब आए और उनका रिश्ता आगे बढ़ा। उस समय राज बब्बर पहले से शादीशुदा थे और उनके बच्चे भी थे। यही वजह थी कि उनके और स्मिता के रिश्ते को लेकर काफी विवाद हुआ और अभिनेत्री को आलोचनाओं का सामना करना पड़ा।
उपलब्ध विवरणों के मुताबिक, स्मिता की मां भी इस रिश्ते से खुश नहीं थीं। महिलाओं के अधिकारों और उनके सम्मान की पक्षधर स्मिता की निजी जिंदगी को लेकर कई सवाल उठाए गए। इस रिश्ते के कारण मां-बेटी के बीच भी तनाव पैदा हुआ था। बताया जाता है कि स्मिता की मां को इस बात का दुख था कि जीवन के आखिरी दौर में उनका अपनी बेटी के साथ रिश्ता पहले जैसा नहीं रह गया था।
राज बब्बर और स्मिता पाटिल का एक बेटा है, प्रतीक बब्बर। प्रतीक का जन्म 28 नवंबर 1986 को हुआ था। हालांकि, बेटे के जन्म के कुछ ही समय बाद स्मिता का निधन हो गया। उनके जाने के बाद प्रतीक की परवरिश मुंबई में उनके नाना-नानी ने की। बड़े होने पर प्रतीक ने भी अभिनय की दुनिया में कदम रखा और फिल्मों में अपनी पहचान बनाई।
31 साल की उम्र में दुनिया को कहा अलविदा
स्मिता पाटिल का जन्म 17 अक्टूबर 1955 को हुआ था। उनके पिता शिवाजीराव पाटिल महाराष्ट्र सरकार में मंत्री थे, जबकि उनकी मां विद्यावती पाटिल सामाजिक कार्यों से जुड़ी थीं। परिवार और सामाजिक परिवेश का उनके व्यक्तित्व पर प्रभाव माना जाता है। उन्होंने अपने अभिनय के जरिए महिलाओं से जुड़े मुद्दों और सामाजिक बदलाव को जिस तरह पर्दे पर प्रस्तुत किया, वह उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता को भी दर्शाता है।
13 दिसंबर 1986 को प्रसव संबंधी जटिलताओं के कारण स्मिता पाटिल का निधन हो गया। उस समय उनकी उम्र महज 31 साल थी। उनके अचानक चले जाने से फिल्म जगत ने एक ऐसी अभिनेत्री खो दी, जिसके सामने अभिनय की कई और संभावनाएं थीं। उनके निधन के बाद भी उनकी कई फिल्में रिलीज हुईं। उनके आखिरी कामों में ‘गलियों का बादशाह’ शामिल थी, जिसे कई साल पहले शूट कर लिया गया था, लेकिन इसकी रिलीज में देरी हुई।
‘गलियों का बादशाह’ में राज कुमार, हेमा मालिनी, मिथुन चक्रवर्ती, पूनम ढिल्लों, अरुणा ईरानी, रंजीत, डैनी डेन्जोंगपा, ओम शिवपुरी और इफ्तिखार जैसे कलाकार शामिल थे। यह फिल्म स्मिता पाटिल की आखिरी फिल्मों में गिनी जाती है। उनके निधन के बाद रिलीज हुई फिल्मों ने भी दर्शकों को उनकी प्रतिभा देखने का मौका दिया।
आखिरी इच्छा के मुताबिक दुल्हन की तरह किया गया था श्रृंगार
स्मिता पाटिल की जिंदगी से जुड़ा एक भावुक प्रसंग उनकी अंतिम इच्छा से जुड़ा है। रिपोर्टों के मुताबिक, वह अपने मेकअप आर्टिस्ट दीपक सावंत से कहा करती थीं कि जब उनका निधन हो, तो उन्हें सुहागन की तरह सजाया जाए। एक बार उन्होंने अभिनेता राज कुमार को लेटकर मेकअप कराते देखा था और दीपक से भी इसी तरह मेकअप करने की बात कही थी। उस समय दीपक ने इसे लेकर असहजता जताई थी।
लेकिन स्मिता के निधन के बाद उनकी इस इच्छा को पूरा किया गया। उनके मेकअप आर्टिस्ट ने उन्हें दुल्हन की तरह सजाया। यह किस्सा आज भी अभिनेत्री की जिंदगी से जुड़े भावुक प्रसंगों में शामिल है। उनके चाहने वालों के लिए यह उनकी निजी इच्छाओं और जीवन के अंतिम अध्याय से जुड़ी एक यादगार बात है।
स्मिता पाटिल का जीवन भले ही लंबा नहीं रहा, लेकिन उन्होंने अपने अभिनय से जो पहचान बनाई, वह समय के साथ धुंधली नहीं हुई। उन्होंने लगभग एक दशक के फिल्मी सफर में कला और व्यावसायिक सिनेमा, दोनों में अपनी छाप छोड़ी। उनके किरदार आज भी भारतीय सिनेमा की यादगार भूमिकाओं में गिने जाते हैं। 71वीं जयंती पर राज बब्बर का उन्हें याद करना इस बात की याद दिलाता है कि स्मिता पाटिल केवल अपने परिवार और करीबियों की यादों में ही नहीं, बल्कि अपने अभिनय के जरिए सिनेमा प्रेमियों के दिलों में भी हमेशा जिंदा रहेंगी।
