1973 में रिलीज़ हुई फ़िल्म हीरा पन्ना, नवकेतन फिल्म्स की वो पेशकश है जिसमें देव आनंद ने न सिर्फ़ लीड रोल निभाया, बल्कि निर्देशन, लेखन और निर्माण भी खुद ही किया। कैमरा हाथ में, दिल में रोमांस, और कार की डिक्की में चुराया हुआ हीरा – यही है हीरा पन्ना का फुल मसाला पैकेज! कहानी: जब प्यार हवा में था… और प्लेन क्रैश में भी! हीरा (देव आनंद) की ज़िंदगी दो चीज़ों से बंधी है: फोटोग्राफी और एयर होस्टेस रीमा (राखी) के लिए उसका अनकहा प्यार। लेकिन जब रीमा की…
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मिस्टर नटवरलाल (1979): ठग, हीरो और बच्चन की पहली ‘बेबाक़’ आवाज़
1979 में एक फिल्म आई जो ठगी की दुनिया से सीधा निकली थी, लेकिन अंदाज़ ऐसा कि जनता कह उठी — “ठगी हो तो ऐसी!”नाम था – मिस्टर नटवरलाल — और हीरो थे अमिताभ बच्चन, जो इस बार सिर्फ एक्शन नहीं, गाना भी गा रहे थे। हां, आपने सही पढ़ा — गाना! और वो भी बच्चों के लिए। कहानी में ट्विस्ट है, और बाघ भी! छोटे नटवर के प्यारे भाई इंस्पेक्टर गिरधारीलाल (अजीत साहब, अपनी शानदार भारी आवाज़ में) को विक्रम सिंह (अमजद खान) झूठे केस में फंसा देता है।अब…
Read More“धर्मेन्द्र Vs डकैत! ‘मेरा गाँव मेरा देश’ में रोमांस, रिवॉल्वर और रफ़ी के राग”
1971 की इस क्लासिक फिल्म में धर्मेन्द्र ने किया है ऐसा अभिनय, मानो जैकी चैन और दिलीप कुमार की आत्मा एक साथ घुस आई हो।नायक अजीत पहले चोर है, फिर खेतों में मेहनती मज़दूर, फिर आशा पारेख, और फिर आखिरकार राइफल वाला रॉबिनहुड। विनोद खन्ना अपने खलनायकी के करियर की शानदार शुरुआत करते हैं, और ऐसा लगता है जैसे वो कह रहे हों – “गब्बर आने वाला है, लेकिन तब तक मैं ही काफी हूँ।” रोमांस: खेतों में प्यार, बैकग्राउंड में बख्शी अंजू (आशा पारेख) और अजीत की लव स्टोरी…
Read MoreTrip to Moon (1967) रेट्रो रिव्यू: दारा सिंह की चांद पर कुश्ती
बॉलीवुड का 1967 का स्पेस मिशन शुरू होता है बिना किसी नासा या इसरो के – बल्कि दारा सिंह के बाइसेप्स के भरोसे। ‘Trip to Moon’, टी.पी. सुंदरम की बनाई हुई साइंस-फिक्शन फिल्म है, जो आज भी एक मून राइड ऑफ मासाला है। चांद पर सिर्फ झंडा नहीं, मुक्का भी गाड़ा गया! आनंद (दारा सिंह) और उसका साथी भागू (भगवान) चंद्रमा पर उतरते हैं, और सामने आते हैं एलियंस, राक्षस, और दूसरे ग्रह के योद्धा, जो लगते हैं जैसे अमर चित्र कथा और रामलीला के बीच का संकर। फिल्म में…
Read Moreरिव्यू: फिल्म फ्लॉप, गाने टॉप! ‘प्रेम पुजारी’ का संगीत आज भी हर दिल अज़ीज़
1970 में रिलीज़ हुई ‘प्रेम पुजारी’ देव आनंद की डायरेक्टोरियल डेब्यू थी। फिल्म में उन्होंने न सिर्फ़ डायरेक्शन किया बल्कि स्क्रिप्ट लिखी और खुद हीरो भी बन गए — मतलब one-man army। लेकिन कहानी में ट्विस्ट ये था कि ऑडियंस ने फिल्म को देखा ही नहीं!जी हां, फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह फ्लॉप हो गई, मगर इसका संगीत ऐसा चला कि आज भी हर लव प्लेलिस्ट में “फूलों के रंग से” और “शोखियों में घोला जाए” बजता ही है। रोमांस, देशभक्ति और स्पाई थ्रिलर का मिक्स मसाला लेफ्टिनेंट रामदेव…
Read Moreरोटी रिव्यू (1974): जब अपराधी बना मास्टरजी और पब्लिक बन गई पागल
अगर आप सोचते हैं कि रोटी सिर्फ आटे और पानी से बनती है — तो जनाब आप मनमोहन देसाई की फिल्म ‘रोटी’ नहीं देखे हैं। यहां राजेश खन्ना aka मंगल सिंह है जो फांसी से भागकर सीधे मास्टरजी बन जाता है। वो भी बिना B.Ed. किए। मुमताज़ हैं बिजली, जो इतनी पॉजिटिव है कि किसी को भी लाइन पर ला सकती हैं — और यहां तक कि एक अपराधी को भी टीचर बना देती हैं। भेष बदलो, माता-पिता चुरा लो, और फिर अपराध बोध में रहो मंगल सिंह ने जिस…
Read Moreकर्मा (1986): देशभक्ति, बदला और बम ब्लास्ट ने बॉक्स ऑफिस फाड़ डाला
1986 की सुपरहिट फिल्म “कर्मा” कोई आम मसाला फिल्म नहीं थी। यह वो टाइम था जब दिलीप कुमार थप्पड़ मारते थे और विलेन की पूरी आत्मा हिल जाती थी। सुभाष घई ने इस फिल्म में देशभक्ति, बदला, थप्पड़, ट्रेनिंग मोंटाज और गाना “ऐ वतन तेरे लिए” को एक ही फ्रेम में पिरोकर बॉक्स ऑफिस का लहूलुहान कर दिया। डॉ. डांग: नाम सुनते ही थप्पड़ की गूंज आती थी अनुपम खेर की सबसे क्रूर, स्लीक और स्लीमी भूमिका – डॉ. माइकल डांग – एक ऐसा आतंकवादी जो जेल में वार्डन पीट…
Read Moreशहीद (1965) रेट्रो रिव्यू: भगत सिंह पर बनी सबसे प्रामाणिक देशभक्ति फिल्म
“तिरंगा सिर पर, पगड़ी जट्टा सम्हाल रे!” — ये कोई मेटा-फोर्स डायलॉग नहीं, बल्कि 60s की वो देशभक्ति थी जो आज भी रोंगटे खड़े कर दे। असेंबली में बम और कैमरे में क्रांति शुरुआत होती है इंडिया के 1911 से — जहां भगत सिंह अपने चाचा अजित सिंह की गिरफ़्तारी देखता है और बचपन से ही क्रांति का Zoom-Call join कर लेता है। लाला लाजपत राय की मौत हो, या असेम्बली में धमाका, भगत सिंह की एंट्री हैट के साथ होती है — literally! और फिर आती है फांसी की…
Read Moreरेट्रो रिव्यू गुड्डी: जब क्रश का इलाज असलियत से होता था
बात उस दौर की है जब सिनेमा ब्लैक एंड व्हाइट से कलर में, और दर्शक रजनीगंधा से रोमांस में बदल रहे थे। लेकिन उसी दौरान आई एक ऐसी फिल्म जिसने सिखाया कि हीरो रील पर जितना चमकता है, रियल में उतना ही पसीना बहाता है। कुसुम उर्फ गुड्डी – बॉलीवुड फैनगर्ल का OG वर्ज़न जया भादुरी (अब बच्चन) की डेब्यू फिल्म “गुड्डी” में वह एक स्कूल की छात्रा हैं, जो धर्मेंद्र की ऑल-इन-वन फैन, फॉलोअर और फ्यूचर वाइफ बनना चाहती है। स्कूल के होमवर्क में “A for Apple” की जगह…
Read Moreशराबी 1964: देव आनंद और मधुबाला का क्लासिक ड्रामा
1964 में बनी शराबी फिल्म, जो हिंदी सिनेमा की एक अनमोल धरोहर है, राज ऋषि के निर्देशन में आई थी। इस फिल्म में देव आनंद और मधुबाला ने अपनी अदाकारी से दिल जीत लिया। मदन मोहन का संगीत और राजेन्द्र कृष्ण के गीतों ने इसे और भी खास बना दिया। कहानी फ़िल्म की कहानी केशव (देव आनंद) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो एक शराबी है और गरीबी की मार झेल रहा है। पिता के निधन के बाद वह खुद को बदलने का वादा करता है, लेकिन जीवन की कठोरता उसे…
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