यूजीसी कानून की क्या  जरूर, आरक्षण पैसे ही घातक बना बैठा………  

भारत वर्तमान की केंद्र सरकार जिस तरह यूजीसी कानून लेकर आई और जिसे माननीय सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है,पता नहीं क्यों केंद्र की सरकार यूजीसी कानून लाई सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था, यूजीसी कानून लाकर सामान्य वर्ग विरोधी पार्टी आज भारतीय जनता पार्टी आज कहीं जा रही है।

जबकि भारतीय जनता पार्टी का सबसे बड़ा मत सामान्य वर्ग का वोट लगभग सत प्रतिशत बीजेपी को जाता है। और ऐसा नहीं है जो भी सामान्य वर्ग के लोग हैं उनके साथ अधिकांश पिछड़ी जात के लोग भी जुड़े हुए हैं जो सवर्णो के साथ है और वोट उनके पक्ष में करते हैं। यह आपको ग्रामीण क्षेत्रों में देखने को मिलेगा लेकिन यूजीसी कानून लाकर सरकार ने अपने पैर में कुल्हाड़ी मारी है, इसके नतीजे चुनाव में लोकसभा में दिखाई देंगे।

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में बाबा योगी आदित्यनाथ की उत्तर प्रदेश में जीत सुनिश्चित है क्योंकि प्रदेश में उनका काम बोल रहा है और जनता देख रही है की जनता है सब जानती है,विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के उद्देश्य से ‘उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम, 2026’ लागू कर दिए हैं। यह रेगुलेशन 15 जनवरी 2026 से देशभर के विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में प्रभावी हो गया है। हालांकि, इसके लागू होते ही देश के विभिन्न हिस्सों में अगड़ी जातियों से जुड़े संगठनों और समूहों ने इसका विरोध शुरू कर दिया है।

नए रेगुलेशन की सबसे अहम विशेषता यह है कि अब अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) के साथ-साथ अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को भी जातिगत भेदभाव की परिभाषा में शामिल किया गया है।नए कानून के तहत अब उच्च शिक्षण संस्थानों में पढ़ने वाले ओबीसी छात्र, शिक्षक और कर्मचारी भी अपने साथ होने वाले जातिगत भेदभाव या उत्पीड़न की शिकायत सक्षम प्राधिकारी के समक्ष दर्ज करा सकेंगे। अब तक जातिगत भेदभाव से जुड़ी शिकायतों और प्रकोष्ठ मुख्य रूप से एससी-एसटी समुदाय तक सीमित थे। नए रेगुलेशन के बाद प्रत्येक संस्थान में एससी, एसटी और ओबीसी के लिए समान अवसर प्रकोष्ठ स्थापित करना अनिवार्य होगा।इसके साथ ही यूनिवर्सिटी स्तर पर एक समानता समिति गठित की जाएगी। इसमें ओबीसी, महिला, एससी, एसटी और दिव्यांग वर्ग के प्रतिनिधियों को सदस्य के रूप में शामिल करना जरूरी होगा।

यह समिति हर छह महीने में अपनी रिपोर्ट तैयार करेगी और उसे यूजीसी को भेजना अनिवार्य होगा।यूजीसी के रेगुलेशन के लागू होने के बाद सामाजिक न्याय की पक्षधर शक्तियों के बीच अगड़ी जातियों में असंतोष को लेकर सवाल उठ रहा है। विरोध करने वाले संगठनों का तर्क है कि इस नियम का दुरुपयोग हो सकता है। इसके जरिए अगड़ी जातियों के छात्रों और शिक्षकों को झूठे मामलों में फंसाया जा सकता है। सरकार को यूजीसी कानून वापस लेना चाहिए यह समाज को तोड़ने का काम कर रहा है।आप हिंदू राष्ट्र बनाएंगे कैसे बनाएंगे जब हिंदुओं को आप खुद बांट रहे जातियों में तो हिंदू एक कैसे होगा आज आरक्षण नासूर बन चुका है जबकि आरक्षण गरीबी के आधार पर हर जाति को प्राप्त होना चाहिए परंतु नहीं मिल रहा है 30 पर्सेंट नंबर पाने वाला नौकरी कर रहा है 80% नंबर पाने वाला रिक्शा चला रहा है।

  बेरोजगार है या डिप्रेशन में है यह आरक्षण है कब खत्म होगा नेता लोग इस आरक्षण के नासूर को कैसे भरेंगे, यह एक कठिन प्रश्न है क्योंकि आरक्षण देश के अनुभवी योग्य लोग आज नौकरी से वंचित हो रहे हैं, जाहिल गवार 30% मार्क्स पाने वाले अच्छे पदों पर बैठे हैं। यह व्यवस्था सिर्फ हिंदुस्तान में है अन्य किसी देश में इस तरह की व्यवस्थाएं नहीं है हर जगह सामान्य रूप से योग्यता के अनुसार हर व्यक्ति को अवसर दिया जाता है, यहां पर 30 परसेंट वाले जब अधिकारी बनेंगे तो देश की नैया डूबेगी।

इतना आरक्षण देने के बावजूद भी सामान्य वर्ग के लोग उनसे अधिक अधिकारी हैं और अच्छे-अच्छे पदों पर हैं क्योंकि उनकी बुद्धि जन्म से है जिसे कोई रोक नहीं सकता चाहे जितना आरक्षण दे दो उन लोगों को, और सुनिए इस देश में जिंदगी भर नौकरी करने वाला व्यक्ति जब रिटायर होता है 30 साल की सेवाएं 35 साल की सेवाएं देने के बाद ईपीएफओ के तहत उसे 2000 या 1000 पेंशन दी जाती है। कोई महंगाई वृद्धि जो साल में मिलती वह नहीं जुड़ती है, और  दशकों तक पेंशन में कभी वृद्धि भी नहीं होती है यह हाल है इस देश का और मंत्री और नेता एक महीना अगर विधायक मंत्री बन जाए पेंशन अन्य बहुत सारी सुविधाएं मिलती रहती है जो 30 साल 35 वर्ष नौकरी कर रहा है पीएफ कट रहा है, उसकी पेंशन मिलती है 1000 या ₹2000  प्रति माह इन लोगों से पूछो ऐसी पेंशन देने से क्या फायदा बंद करो रुपया ₹1000 नमक चाटने का भी पैसा नहीं है महीने का इन लोगों को दिखाई नहीं देता यह सब व्यवस्थाएं कितनी खराब है सरकार इनमें सुधार नहीं करती है।

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