नेशनल डेस्क: परिसीमन बिल को लेकर देश की राजनीति में बहस तेज हो गई है। सत्ता पक्ष और विपक्ष इस मुद्दे पर आमने-सामने हैं। यह प्रस्ताव केवल चुनावी क्षेत्रों की सीमाएं बदलने तक सीमित नहीं है, बल्कि लोकसभा की सीटों की संख्या, राज्यों के प्रतिनिधित्व और महिलाओं के आरक्षण जैसे महत्वपूर्ण विषयों से भी जुड़ा हुआ है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि परिसीमन बिल क्या है और इससे क्या बदलाव हो सकते हैं।
क्या होता है परिसीमन?
परिसीमन का अर्थ लोकसभा और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण करना है। इस प्रक्रिया के तहत यह तय किया जाता है कि कौन-सा गांव, कस्बा या इलाका किस संसदीय या विधानसभा क्षेत्र में शामिल होगा। इसका मुख्य उद्देश्य आबादी के आधार पर सभी निर्वाचन क्षेत्रों में संतुलित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना होता है।
परिसीमन के दौरान अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों की संख्या और उनका निर्धारण भी किया जाता है। भारत में यह कार्य परिसीमन आयोग के माध्यम से किया जाता है।
2026 के परिसीमन प्रस्ताव में क्या है?
सरकार का तर्क है कि लोकसभा की कुल 543 सीटों की व्यवस्था लंबे समय से बनी हुई है, जबकि देश की आबादी 1972 के बाद काफी बढ़ चुकी है। इसी को ध्यान में रखते हुए संविधान संशोधन के जरिए लोकसभा की अधिकतम सदस्य संख्या बढ़ाने का प्रस्ताव रखा गया है।
प्रस्ताव के अनुसार लोकसभा की अधिकतम सदस्य संख्या 550 से बढ़ाकर 850 किए जाने का विचार है। इनमें राज्यों से 815 और केंद्र शासित प्रदेशों से 35 सदस्य शामिल होंगे।
महिलाओं के आरक्षण पर क्या असर पड़ेगा?
106वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2023 के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटों का आरक्षण प्रावधान किया गया था। यह व्यवस्था पहली जनगणना के बाद लागू होनी थी।
वर्तमान में जनगणना के लिए संदर्भ तिथि 1 मार्च 2027 निर्धारित है। ऐसे में संभावना जताई जा रही है कि 2027 की जनगणना के आधार पर परिसीमन की प्रक्रिया 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले पूरी नहीं हो पाएगी। इसका मतलब यह हो सकता है कि महिलाओं के लिए आरक्षण 2029 के चुनाव में लागू न हो। वहीं संविधान संशोधन विधेयक इस अनिवार्यता को समाप्त करने का भी प्रस्ताव करता है।
परिसीमन आयोग कैसे बनेगा?
परिसीमन विधेयक, 2026 के तहत केंद्र सरकार को परिसीमन आयोग गठित करने का अधिकार दिया जाएगा। आयोग में सर्वोच्च न्यायालय के वर्तमान या पूर्व न्यायाधीश को अध्यक्ष बनाया जाएगा। इसके अलावा मुख्य निर्वाचन आयुक्त या उनके द्वारा नामित निर्वाचन आयुक्त तथा संबंधित राज्य के राज्य निर्वाचन आयुक्त आयोग के सदस्य होंगे। आयोग के अध्यक्ष की नियुक्ति केंद्र सरकार करेगी।
विपक्ष क्यों कर रहा है विरोध?
विपक्ष का कहना है कि यदि लोकसभा सीटों का पुनर्वितरण केवल आबादी के आधार पर किया गया तो दक्षिण भारत के राज्यों का संसदीय प्रतिनिधित्व प्रभावित हो सकता है।
1971 की जनगणना के आधार पर राज्यों के बीच लोकसभा सीटों का बंटवारा लंबे समय से स्थिर है। 84वें संविधान संशोधन के तहत यह व्यवस्था 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना तक बढ़ा दी गई थी।
विपक्ष का तर्क है कि तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है। यदि नई सीटों का निर्धारण केवल वर्तमान आबादी के आधार पर हुआ तो अधिक आबादी वाले राज्यों को अपेक्षाकृत अधिक सीटें मिल सकती हैं, जिससे दक्षिणी राज्यों की हिस्सेदारी कम हो सकती है। इसी वजह से यह मुद्दा दक्षिण और उत्तर भारत के राजनीतिक प्रतिनिधित्व की बहस का केंद्र बन गया है।
