नई दिल्ली: जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले प्रदर्शनकारियों और 20 जुलाई को संसद तक मार्च में शामिल लोगों के खिलाफ दर्ज मामलों को लेकर केंद्र सरकार ने सकारात्मक रुख अपनाया है। सरकार पहले ही संकेत दे चुकी है कि शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन करने वालों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होगी और जिन प्रदर्शनकारियों पर एफआईआर दर्ज हो चुकी है, उन्हें वापस लेने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि दर्ज एफआईआर आखिर कानूनी तौर पर वापस कैसे ली जाती है और इसमें अंतिम फैसला किसका होता है।
सरकार की सहमति के बाद शुरू होती है कानूनी प्रक्रिया
जंतर-मंतर पर सोनम वांगचुक 28 जून से भूख हड़ताल पर थे। बाद में केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह की मौजूदगी में मेदांता अस्पताल में उन्होंने अपना अनशन समाप्त किया। इस दौरान केंद्र सरकार ने भरोसा दिया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले छात्रों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की जाएगी और दर्ज मामलों को वापस लेने की दिशा में कानूनी प्रक्रिया अपनाई जाएगी।
36 दिन के आंदोलन में दिल्ली में 15 से 20 एफआईआर दर्ज होने का दावा
13 जून 2026 से 25 जुलाई 2026 तक जंतर-मंतर पर चले 36 दिनों के आंदोलन के दौरान केवल दिल्ली में ही 15 से 20 एफआईआर दर्ज होने का दावा किया गया है। सरकार इन मामलों को वापस लेने पर सहमत है, लेकिन प्रत्येक मामले में निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य होगा।
स्टेप-बाय-स्टेप समझिए FIR वापस लेने की पूरी प्रक्रिया
सरकार की मंजूरी मिलने के बाद अभियोजन पक्ष यानी दिल्ली पुलिस उपराज्यपाल को मामलों को वापस लेने के लिए प्रस्ताव भेजेगी। इसमें बताया जाएगा कि संबंधित मामलों में आगे अभियोजन नहीं चलाया जाना है।
उपराज्यपाल की मंजूरी मिलने के बाद दिल्ली पुलिस संबंधित अदालत में आवेदन दाखिल करेगी और अदालत को बताएगी कि इन मामलों में आगे अभियोजन नहीं चलाना चाहती।
इसके बाद अंतिम निर्णय अदालत के अधिकार क्षेत्र में होगा। अदालत सभी तथ्यों और आवेदन पर विचार करने के बाद तय करेगी कि एफआईआर या मुकदमा वापस लिया जाएगा या नहीं। यानी किसी भी मामले को समाप्त करने की अंतिम मुहर अदालत ही लगाएगी।
किन मामलों में केस वापस नहीं होंगे?
जानकारी के अनुसार, जिन मामलों में पत्रकारों ने अपने ऊपर हमले की शिकायत दर्ज कराई है या पुलिसकर्मियों के साथ मारपीट के आरोप हैं, वे मामले स्वतः वापस नहीं होंगे। इन पर अलग से कानूनी प्रक्रिया लागू होगी।
बताया गया है कि जंतर-मंतर आंदोलन और उससे जुड़े घटनाक्रम में करीब 20 मामले दर्ज हुए हैं। इनमें 14 मामले प्रदर्शन और हिंसा से जुड़े हैं। एक मामला बिना अनुमति ड्रोन उड़ाने का है, जबकि बाकी मामले पत्रकारों और पुलिसकर्मियों के साथ कथित मारपीट से संबंधित हैं।
अगर मुख्य प्रक्रिया अटक जाए तो ये हैं तीन वैकल्पिक कानूनी रास्ते
यदि सामान्य प्रक्रिया के तहत मामलों की वापसी में किसी प्रकार की बाधा आती है तो कानून में अन्य विकल्प भी उपलब्ध हैं।
पहला विकल्प क्लोजर रिपोर्ट का है। यदि चार्जशीट दाखिल नहीं हुई है और पुलिस को पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलते या मामला केवल प्रदर्शन से जुड़ा माना जाता है, तो पुलिस अदालत में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर सकती है। मजिस्ट्रेट के स्वीकार करने पर मामला समाप्त हो सकता है।
दूसरा विकल्प उच्च न्यायालय का है। यदि गंभीर धाराएं लगी हों या निचली अदालत से राहत न मिले तो प्रभावित पक्ष उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है। नए कानून बीएनएसएस की धारा 528 के तहत उच्च न्यायालय विशेष परिस्थितियों में एफआईआर रद्द करने का अधिकार रखता है।
तीसरा विकल्प लोक अदालत का है। रास्ता रोकने, धारा 144 के उल्लंघन या बिना अनुमति प्रदर्शन जैसे अपेक्षाकृत छोटे मामलों का निस्तारण सरकार और संबंधित पक्षों की सहमति से लोक अदालत के माध्यम से किया जा सकता है।
बिहार की कार्रवाई पर भी उठे सवाल
इस बीच बिहार में प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर पुलिस द्वारा एके-47 से गोली चलाने और लाठीचार्ज किए जाने के आरोपों को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रिया भी सामने आई है। इस मुद्दे पर एनडीए के कुछ सांसदों ने भी विरोध जताते हुए कहा है कि वे ऐसी कार्रवाई के पक्ष में नहीं हैं।
