
उत्तर प्रदेश के मेरठ से आया एक बयान पुलिस-प्रेस समीकरण में हलचल ले आया है। खबर है कि मेरठ की DSP सौम्या अस्थाना ने निर्देश दिया है कि अगर किसी थाने के अंदर कोई पत्रकार वीडियोग्राफी करता मिला, तो उसके खिलाफ मुकदमा दर्ज किया जा सकता है।
आदेश छोटा है, पर बहस लंबी।
अब सवाल यह है कि यह कदम सुरक्षा और गोपनीयता के लिए है, या फिर पारदर्शिता पर हल्की सी ‘नो एंट्री’ पट्टी?
पत्रकार बनाम ‘पत्रसेल्सकार’ मॉडल
पत्रकार का काम है सवाल पूछना, कैमरा ऑन रखना, कमियां उजागर करना। लेकिन सिस्टम को शायद अब “पत्रसेल्सकार” चाहिए। यानी ऐसा शख्स जो खबर से ज्यादा हामी भरे, रिपोर्ट से ज्यादा रसीद संभाले और अंदर आने से पहले तीन बार पूछे “May I come in, sir?”
यह तंज है, लेकिन बहस असली है।
सुरक्षा या सेंसरशिप?
थाने संवेदनशील जगह होते हैं। वहां केस डायरी, आरोपियों की जानकारी और जांच से जुड़े दस्तावेज रहते हैं। बिना अनुमति वीडियोग्राफी पर रोक को प्रशासन सुरक्षा के नजरिए से देख सकता है।

लेकिन दूसरी तरफ प्रेस की भूमिका भी लोकतंत्र की रीढ़ मानी जाती है। पारदर्शिता और जवाबदेही के लिए कैमरा कई बार जरूरी औजार बन जाता है।
यहीं टकराव की जमीन तैयार होती है।
क्या पत्रकारिता का काम सिर्फ प्रेस नोट पढ़ना रह जाएगा? या फिर कैमरा और सवाल दोनों के लिए जगह बचेगी? मेरठ की इस घटना ने यही बहस फिर से जगा दी है कि सीमाएं कहां तय हों और किसके द्वारा।
प्रशासनिक सिग्नल
ऐसे आदेश, चाहे मौखिक हों या लिखित, केवल प्रशासनिक निर्देश नहीं रहते। वे संदेश बन जाते हैं। एक तरफ कानून-व्यवस्था की मजबूती का दावा, दूसरी तरफ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सवाल। दोनों के बीच संतुलन ही असली परीक्षा है।
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