Mamata सरकार की बहानेबाज़ी पर कोर्ट का ब्रेक, SIR को फास्ट-फॉरवर्ड!

संजीव पॉल
संजीव पॉल

पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के Special Intensive Revision यानी SIR को लेकर सुनवाई के दौरान Supreme Court of India ने राज्य सरकार को कड़े शब्दों में फटकार लगाई।

पीठ की अगुवाई कर रहे Surya Kant ने साफ कहा कि हर दिन नए बहाने बनाकर प्रक्रिया को लटकाना स्वीकार्य नहीं है। अदालत का लहजा साफ था, संदेश और भी साफ।

SIR पर क्यों मचा है सियासी संग्राम?

मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण लोकतंत्र का बैकएंड सिस्टम है। यह वह इंजन है जो चुनावी गाड़ी को सही रास्ते पर रखता है।

कोर्ट ने साफ किया कि वह अपनी विशेष शक्तियों का उपयोग कर यह सुनिश्चित कर रहा है कि Election Commission of India का काम तय समय में पूरा हो।

इतना ही नहीं, प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए झारखंड और ओडिशा से न्यायिक अधिकारियों की तैनाती भी की गई है। संदेश यह कि “स्पीड ब्रेकर हटाइए, काम आगे बढ़ाइए।”

कपिल सिब्बल की दलीलें और कोर्ट का जवाब

राज्य सरकार की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील Kapil Sibal ने दलील दी कि चुनाव आयोग के अधिकारी न्यायिक अधिकारियों को ट्रेनिंग दे रहे हैं, जो आदेश का उल्लंघन है।

इस पर जस्टिस Joymalya Bagchi ने सीधा सवाल दागा, “अगर आयोग ट्रेनिंग नहीं देगा, तो कौन देगा?” कोर्ट ने साफ कर दिया कि आदेश बिल्कुल स्पष्ट है और अतिरिक्त जिम्मेदारी सिर्फ प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए दी गई है। सिब्बल की आपत्तियां यहीं ठंडी पड़ गईं।

मुख्य सचिव को साथ मिलकर काम करने का निर्देश

सुनवाई के दौरान मुख्य सचिव की भूमिका भी चर्चा में आई। अदालत ने निर्देश दिया कि राज्य प्रशासन और चुनाव आयोग को मिलकर काम करना होगा।

कोर्ट का जोर इस बात पर था कि दस्तावेजों की वैधता और दावों का अंतिम फैसला केवल न्यायिक अधिकारी ही करेंगे। इसमें किसी तरह की राजनीतिक या प्रशासनिक धुंध की गुंजाइश नहीं छोड़ी गई।

पूरक सूची पर कोर्ट का अंतिम रुख

28 फरवरी को अंतिम मतदाता सूची जारी होने के बाद पूरक सूची निकालने की मांग भी उठी। लेकिन अदालत ने स्पष्ट किया कि पूरी प्रक्रिया पहले से तय है और नियमों के मुताबिक चलेगी। किस दस्तावेज को स्वीकार करना है, यह पहले ही परिभाषित किया जा चुका है।

संकेत साफ है: प्रक्रिया कोर्ट की निगरानी में है, और देरी या सियासत की गुंजाइश सीमित।

लोकतंत्र की घड़ी और सियासत की सुई

लोकतंत्र की मशीनरी में समय सबसे कीमती पुर्जा है। अगर मतदाता सूची ही समय पर अपडेट न हो, तो चुनावी भरोसा भी डगमगाता है। कोर्ट की सख्ती सिर्फ प्रशासनिक फटकार नहीं, बल्कि एक संदेश है कि संवैधानिक संस्थाओं का कैलेंडर सियासी मौसम से अलग चलता है। बहानों की बैटरी आखिर कब तक चलेगी? अदालत ने संकेत दे दिया है कि अब चार्जर सीधे संविधान से जुड़ा है।

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