लखनऊ: उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारी के बीच समाजवादी पार्टी एक बार फिर 2024 लोकसभा चुनाव की रणनीति को दोहराने के मिशन पर आगे बढ़ती दिख रही है। पार्टी ने जनता तक अपना संदेश पहुंचाने के लिए विशेष बुकलेट तैयार कराई है, जिसे अब संगठन स्तर पर गांव-गांव वितरित किया जा रहा है।
2024 के नैरेटिव को फिर बनाया आधार
साल 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ मिलकर समाजवादी पार्टी ने ‘संविधान और आरक्षण पर खतरे’ का जो राजनीतिक नैरेटिव खड़ा किया था, अब वही आगामी विधानसभा चुनाव की रणनीति का केंद्रीय आधार बनाया जा रहा है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव लगातार भाजपा सरकार पर नौकरी और आरक्षण से जुड़े मुद्दों को लेकर हमलावर हैं और इसे अपने पीडीए फॉर्मूले से जोड़कर आगे बढ़ा रहे हैं।
गांवों में पहुंच रही ‘ऑडिट रिपोर्ट’ बुकलेट
पार्टी के कार्यकर्ता अब जमीनी स्तर पर गांव-गांव जाकर भाजपा सरकार के खिलाफ तैयार की गई ऑडिट रिपोर्ट और बुकलेट का वितरण कर रहे हैं। इस अभियान के जरिए मतदाताओं तक यह संदेश पहुंचाने की कोशिश की जा रही है कि मौजूदा सरकार के तहत आरक्षण और सामाजिक न्याय के मुद्दों पर गंभीर सवाल खड़े हैं।
2024 की जीत से मिला नया राजनीतिक मॉडल
सपा ने 2012 में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी, लेकिन 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में उसे करारी हार का सामना करना पड़ा। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक पार्टी की सीमित छवि के चलते उसे नुकसान हुआ। इसी स्थिति को देखते हुए 2024 के लोकसभा चुनाव में रणनीति बदली गई, जिसमें गैर-यादव पिछड़ी जातियों को जोड़ने और संविधान के मुद्दे को केंद्र में रखने पर जोर दिया गया, जिसके चलते गठबंधन को 42 सीटों पर सफलता मिली।
संविधान और आरक्षण पर फोकस बढ़ा
अब समाजवादी पार्टी उसी मॉडल को आगे बढ़ाते हुए लगातार संविधान, आरक्षण और सामाजिक न्याय के मुद्दों को अपने भाषणों और अभियानों में प्रमुखता दे रही है। अखिलेश यादव पासी, कुर्मी, निषाद, मौर्य और शाक्य जैसी गैर-यादव पिछड़ी और दलित उपजातियों के बीच अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।
‘पीडीए ऑडिट पुस्तिका’ का व्यापक वितरण
सपा नेतृत्व की ओर से ‘पीडीए ऑडिट पुस्तिका’ बड़े पैमाने पर छपवाकर सभी जिलों में भेजी गई है। पार्टी पदाधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे इस पुस्तिका को घर-घर और गांव-गांव तक पहुंचाएं। इसमें दावा किया गया है कि भाजपा सरकार ने पिछड़ों की 14 हजार से अधिक सरकारी नौकरियों पर असर डाला है और उनके साथ अन्याय हुआ है।
