
“हाथी के दांत दिखाने के और, खाने के और”— यह कहावत इस वक्त भारतीय जनता पार्टी पर सटीक बैठती दिख रही है। उत्तर प्रदेश विधानसभा के शीतकालीन सत्र के दौरान 50 ब्राह्मण विधायकों की गुप्त बैठक ने भाजपा के भीतर सियासी खलबली मचा दी है।
यह बैठक कुशीनगर के भाजपा विधायक पी.एन. पाठक के लखनऊ स्थित आवास पर उनकी पत्नी के जन्मदिन के बहाने आयोजित हुई, लेकिन एजेंडा पूरी तरह राजनीतिक था।
लिट्टी-चोखा, फलाहार और भीतर उबाल
बैठक में शामिल विधायकों को लिट्टी-चोखा और मंगलवार व्रत का फलाहार परोसा गया, लेकिन बातचीत में जो परोसा गया, वह था— नाराज़गी, असंतोष और राजनीतिक चेतावनी।
बैठक में शामिल प्रमुख नाम:
- डॉ. शलभ मणि त्रिपाठी
- रत्नाकर मिश्रा
- साकेत मिश्रा (MLC)
- उमेश द्विवेदी (MLC)
- ऋषि त्रिपाठी, प्रेम नारायण पांडेय, प्रकाश द्विवेदी सहित करीब 45–50 विधायक
इस जुटान को नाम दिया गया—‘सहभोज’, लेकिन भाजपा के लिए यह सिरदर्द भोज बन गया।
मुख्य शिकायत: “संघ-सरकार-संगठन में सुनवाई नहीं”
बैठक में साफ कहा गया कि RSS, BJP संगठन और सरकार में ब्राह्मणों की कोई सुनवाई नहीं। कोई ऐसा पावर सेंटर नहीं, जहां समाज अपनी बात रख सके। संगठन और मंत्रिमंडल में ब्राह्मणों का कद लगातार घटाया जा रहा है।
“हम वोट बैंक हैं, लेकिन निर्णयकर्ता नहीं”— यही बैठक का सार था
डिप्टी सीएम हैं, लेकिन ताकत नहीं?
विधायकों का मानना है कि ब्राह्मण समाज से डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक हैं। लेकिन उन्हें राजनीतिक ताकत नहीं दी गई। बड़े फैसलों में उनकी भूमिका सीमित है।
सुनील भराला प्रकरण: नाराज़गी की जड़
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष चुनाव में सुनील भराला का नामांकन ऐन वक्त पर रुकवाया जाना भी इस नाराज़गी की बड़ी वजह बना।
ब्राह्मण नेताओं का बड़ा वर्ग उनके साथ था। पार्टी नेतृत्व के हस्तक्षेप से नामांकन नहीं हो पाया। संदेश साफ गया—ब्राह्मणों को मौका नहीं।

ठाकुर, कुर्मी, लोध… सबकी बैठक, ब्राह्मणों पर मिर्चा क्यों?
यही सबसे बड़ा सवाल है। ठाकुर विधायकों की ‘कुटुंब परिवार’ बैठक, कुर्मी समाज की अयोध्या बैठक। लोध समाज की लखनऊ बैठक तब भाजपा खामोश रही। लेकिन जैसे ही ब्राह्मण विधायक इकट्ठा हुए, पार्टी असहज हो गई।
यानी— जातीयता बोओ, लेकिन ब्राह्मण उगें तो दिक्कत!
ब्राह्मण वोट बैंक: BJP की रीढ़?
UP में ब्राह्मण आबादी: 11–12%, 2022 विधानसभा चुनाव में BJP को 89% ब्राह्मण वोट। लगभग 30 जिलों में निर्णायक भूमिका। एक ब्राह्मण मतदाता औसतन 10 वोट प्रभावित करता है।
इतिहास गवाह है ब्राह्मण जहां गया, सरकार वहीं बनी। कांग्रेस, भाजपा, बसपा, सपा—सबने अनुभव किया।
इटावा कांड और बढ़ती नाराज़गी
इटावा कथावाचक कांड के बाद सरकार की चुप्पी। ब्राह्मण विधायकों की अनुपस्थिति। अखिलेश यादव का मौके पर पहुंचना। इससे ब्राह्मण समाज में संदेश गया— “अपनों ने नहीं सुना, विपक्ष ने सुना।”
2027 से पहले बड़ा सवाल
अब सवाल सिर्फ BJP का नहीं है— क्या ब्राह्मणों की यह एकजुटता। अन्य जातीय समीकरणों को भी चुनौती दे रही है? क्या भाजपा फिर से वही गलती दोहरा रही है जो कभी कांग्रेस ने की थी?
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