रात 2:30 बजे… घर में सन्नाटा था, लेकिन एक कमरे में इंसानियत का गला कट रहा था। वो पिता था… लेकिन उस रात उसने अपने ही खून को मिटा दिया। और सवाल ये है — क्या ये सिर्फ एक हत्या थी या समाज की सड़ी हुई सोच का नतीजा? कानपुर की इस घटना ने सिर्फ दो मासूम जिंदगियां नहीं छीनीं, बल्कि उस भरोसे को भी तोड़ दिया जिसे हम “परिवार” कहते हैं।जो आदमी बेटियों को गोद में खिलाता है, वही उनकी सांसें छीन ले — ये सिर्फ अपराध नहीं, मानसिक दिवालियापन…
Read More