यरुशलम: इजरायल के आम संसदीय चुनाव 2026 के अंतिम नतीजों ने प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के सामने सरकार बनाने की चुनौती खड़ी कर दी है। नेतन्याहू के दक्षिणपंथी गठबंधन को 53 सीटें मिली हैं, जबकि सरकार बनाने के लिए 61 सीटों की जरूरत है। वहीं विपक्षी गठबंधन 48 सीटों पर सिमट गया है। ऐसे में किसी भी पक्ष को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है।
इस चुनाव में 19 सीटें जीतने वाली अरब पार्टियां निर्णायक स्थिति में पहुंच गई हैं। अब सरकार गठन में उनकी भूमिका अहम हो गई है। यही पार्टियां तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं कि नेतन्याहू सत्ता में बने रहेंगे या विपक्ष सरकार बनाने में सफल होगा। निवर्तमान संसद में अरब पार्टियों के पास कुल 10 सीटें थीं। इस बार उनका आंकड़ा 2020 के 15 सीटों के पिछले रिकॉर्ड से भी आगे निकल गया है।
अरब पार्टियां क्यों बन गईं किंगमेकर?
इजरायल में सरकार बनाने के लिए संसद यानी नेसेट की 120 सीटों में से कम से कम 61 सीटों का समर्थन जरूरी है। नेतन्याहू के गठबंधन को 53 और विपक्ष को 48 सीटें मिली हैं। ऐसे में 19 सीटें जीतने वाली अरब पार्टियों का समर्थन सरकार गठन के समीकरण बदल सकता है।
विपक्षी और अरब पार्टियों की सीटों को जोड़ने पर कुल संख्या 67 हो जाती है। यह नेतन्याहू और उनके दक्षिणपंथी सहयोगियों इतामार बेन ग्विर और बेजालेल स्मोट्रिच के खिलाफ व्यापक राजनीतिक विरोध को भी दर्शाता है।
अरब पार्टियों के समर्थन के बिना विपक्ष बहुमत के आंकड़े तक नहीं पहुंच सकता। दूसरी ओर, नेतन्याहू के लिए भी अपने धुर दक्षिणपंथी और अति-रूढ़िवादी सहयोगियों के साथ बहुमत जुटाने का रास्ता फिलहाल स्पष्ट नहीं है।
अरब पार्टियां क्या चाहती हैं?
यूसुफ जबरीन के नेतृत्व वाले जॉइंट लिस्ट गठबंधन ने सरकार में शामिल हुए बिना किसी वैकल्पिक सरकार को समर्थन देने की पेशकश की है। इस गठबंधन में हदाश, ता’अल और बलाद शामिल हैं।
वहीं, मंसूर अब्बास के नेतृत्व वाली राम पार्टी ने कहा है कि यदि आइसेनकोट के नेतृत्व में कोई व्यावहारिक गठबंधन बनता है तो वह उसमें शामिल होने के लिए तैयार है। राम पार्टी 2021 में नफ्ताली बेनेट के नेतृत्व वाली सरकार का हिस्सा रह चुकी है।
दोनों पक्षों की प्राथमिकता नेतन्याहू को सत्ता से हटाना है। इसके साथ ही वे संगठित अपराध पर कार्रवाई, आवास की कमी दूर करने और अरब समुदायों में सरकारी निवेश बढ़ाने जैसे मुद्दों पर ठोस आश्वासन मांग सकते हैं।
सरकार गठन की राह में क्या हैं अड़चनें?
विपक्ष के नेताओं आइसेनकोट, नफ्ताली बेनेट और एविग्डोर लिबरमैन ने अरब सांसदों के समर्थन पर निर्भर नहीं रहने का वादा किया है। नेतन्याहू भी लंबे समय से अरब पार्टियों को संभावित राजनीतिक साझेदार मानने का विरोध करते रहे हैं।
मतदान के बाद नेतन्याहू ने चुनाव में धांधली का आरोप लगाया और कहा कि किसी भी जायोनी पार्टी को राम या जॉइंट लिस्ट के साथ सहयोग नहीं करना चाहिए।
दूसरी ओर, डेमोक्रेट्स पार्टी के नेता यायर गोलान ने विपक्ष से मिलकर सरकार बनाने के लिए सहयोग करने की अपील की है। उन्होंने नेतन्याहू पर गैर-जायोनी अति-रूढ़िवादी दलों पर निर्भर रहने का आरोप लगाया।
सरकार बनाने के लिए क्या हैं विकल्प?
इजरायल में मौजूदा चुनावी नतीजों के बाद सरकार गठन के कई रास्ते सामने हैं।
1. राम पार्टी के साथ विपक्षी गठबंधन
विपक्ष अपने पहले के रुख में बदलाव कर राम पार्टी के साथ गठबंधन बना सकता है। इससे बहुमत के आंकड़े तक पहुंचने का रास्ता खुल सकता है।
2. अल्पमत सरकार को बाहर से समर्थन
विपक्ष राम पार्टी को सरकार में शामिल करके अल्पमत सरकार बनाने की कोशिश कर सकता है। ऐसी स्थिति में जॉइंट लिस्ट बाहर से सरकार को समर्थन दे सकती है।
3. नेतन्याहू के साथ मिली-जुली सरकार
एक विकल्प नेतन्याहू के साथ मिलकर साझा सरकार बनाने का भी है। हालांकि, इससे उन मतदाताओं में नाराजगी बढ़ सकती है जिन्होंने बदलाव की उम्मीद में मतदान किया है।
4. फिर से हो सकते हैं चुनाव
यदि कोई भी गठबंधन बहुमत जुटाने में सफल नहीं होता है तो इजरायल में दोबारा चुनाव कराने की नौबत आ सकती है।
1993 का उदाहरण और 2022 का अनुभव
इजरायल में इससे पहले भी बाहरी समर्थन के सहारे सरकार चलाने का उदाहरण रहा है। 1993 में यित्जाक राबिन ने इसी तरह की व्यवस्था के तहत सरकार चलाई थी। हालांकि, ऐसे गठबंधन में सांसदों के पाला बदलने का खतरा बना रहता है। 2022 में नफ्ताली बेनेट के गठबंधन के साथ भी इस तरह की राजनीतिक अस्थिरता देखने को मिली थी।
फिलहाल चुनावी नतीजों ने नेतन्याहू के सामने सत्ता बचाने की चुनौती खड़ी कर दी है। वहीं विपक्ष के लिए भी अरब पार्टियों के समर्थन के बिना बहुमत तक पहुंचना मुश्किल है। आने वाले दिनों में गठबंधन को लेकर होने वाली बातचीत से इजरायल की अगली सरकार की तस्वीर साफ हो सकती है।
