सर्वसम्मति का आतंक: जब भीड़ ही बन जाए न्यायाधीश

आशीष शर्मा (ऋषि भारद्वाज)
आशीष शर्मा (ऋषि भारद्वाज)

लोकतंत्र में सबसे खतरनाक शब्द “तानाशाह” नहीं होता, सबसे खतरनाक शब्द होता है — “सब यही मानते हैं।”

क्योंकि जब “सब” मानने लगते हैं, तब सोचने की ज़रूरत खत्म हो जाती है। आज हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ
सच का फैसला अदालत या तर्क नहीं, भीड़ का मूड करता है।

Majority = Right? यह भ्रम क्यों खतरनाक है

बहुमत हमेशा सही हो यह लोकतंत्र का सिद्धांत नहीं, यह भीड़ का आत्मविश्वास है। इतिहास गवाह है कि majority कई बार गलत रही है, और minority ही भविष्य लेकर आई है। लेकिन आज सवाल यह नहीं कि कौन सही है, आज सवाल यह है कि कौन ज़्यादा लोग एक साथ बोल रहे हैं। 

Social Media: जहाँ Volume ही Logic है

सोशल मीडिया ने एक नया फार्मूला दिया है Loud = Legit- Viral = वैलिड, यहाँ argument नहीं चलते, यहाँ engagement चलता है।

जो ट्रेंड कर रहा है, वही “सही” माना जाता है। Fact-check boring है, लेकिन outrage entertaining।

असहमति अब Opinion नहीं, Offence है

एक समय था जब disagree करना healthy debate कहलाता था। आज disagree करना संदेहास्पद गतिविधि बन चुका है। अगर आपने सवाल पूछा, तो आप “confused” हैं।

अगर आपने दूसरा नजरिया रखा, तो आप “agenda-driven” हैं। और अगर आपने चुप रहना चुना, तो भी आप “coward” हैं।

Moral Policing 2.0: अब विचार भी कंट्रोल में

पहले moral पोलिसिंग कपड़ों तक सीमित थी। अब यह सोच, भाषा और सवालों तक पहुँच चुकी है।

आप क्या सोचते हैं, यह भी अब public approval का मामला है। आपकी नैतिकता आप नहीं तय करते, आपकी timeline तय करती है।

Satyagraha से Shouting Match तक

लोकतंत्र की आत्मा संवाद में थी। आज संवाद नहीं, shouting match है। जो ज़्यादा तेज़ बोले, जो ज़्यादा गुस्सा दिखाए, वही ज़्यादा नैतिक माना जाता है। शांति को कमजोरी समझा जाने लगा है, और विवेक को संदेह की नज़र से देखा जाता है।

Media Trial नहीं, Crowd Trial

आज कई फैसले कोर्ट में नहीं, comment section में हो जाते हैं। Headline पहले verdict देती है, fact बाद में खोजा जाता है। Narrative बिकता है, सच्चाई नहीं। और जो narrative से बाहर गया, वह “problematic” घोषित कर दिया गया।

Debate Open है, Conclusion Locked

हम कहते हैं, “Debate open है।” लेकिन यह वही open debate है जहाँ conclusion पहले से तय है। आप बोल सकते हैं, बस वही बोलिए
जो बाकी सब बोल रहे हैं। बाकी विचारों को “dangerous”, “toxic” या “anti” बता दिया जाएगा।

Fear का नया रूप: Cancel Culture

आज डर जेल का नहीं, cancel होने का है। नौकरी जाएगी या नहीं, यह कोर्ट तय नहीं करता। यह फैसला भीड़ के ट्रेंडिंग मूड पर निर्भर है। एक clip, एक screenshot, और पूरा context गायब।

Democracy Survives on Dissent

लोकतंत्र unanimity से नहीं, असहमति से जिंदा रहता है। जहाँ हर कोई एक जैसा सोचने लगे, वहाँ सोच मर जाती है। और जब सोच मरती है, तब लोकतंत्र सिर्फ एक सुंदर शब्द बनकर रह जाता है।

सवाल पूछना अपराध नहीं

अगर सवाल पूछना गलत है, तो जवाब सही कैसे हो सकता है? अगर भीड़ नैतिकता तय करेगी, तो कल वही भीड़ किसी और को निशाना बनाएगी। आज जो तालियाँ बजा रहा है, कल वही कटघरे में खड़ा हो सकता है।

लोकतंत्र को बचाने के लिए सबसे ज़रूरी है अलग सोचने की आज़ादी।

भीड़ के साथ चलना आसान है, लेकिन सच अक्सर भीड़ से बाहर खड़ा होता है। और सच हमेशा तुरंत पसंद नहीं आता।

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