मेहमान गायब, शहर लॉक! इस्लामाबाद बना छावनी- पाकिस्तान की फजीहत?

अजीत उज्जैनकर
अजीत उज्जैनकर

शहर बंद है… लेकिन मेहमान आया ही नहीं। सड़कों पर सन्नाटा है, स्कूलों के गेट बंद हैं और लोगों के मन में सिर्फ एक सवाल—ये सब आखिर क्यों? ये कहानी सिर्फ एक सुरक्षा व्यवस्था की नहीं, बल्कि उस कूटनीतिक बेचैनी की है जिसमें एक देश खुद को फंसा बैठा है।

इस्लामाबाद बना ‘रेड जोन’: लेकिन क्यों?

Islamabad इन दिनों पूरी तरह सील है—कंटेनरों से घिरी सड़कों और भारी सुरक्षा बलों के बीच। सरकार का दावा है कि ये सब US-ईरान वार्ता के लिए सुरक्षा इंतजाम हैं, लेकिन हकीकत ये है कि Iran पहले ही साफ कर चुका है कि वह United States के साथ किसी भी बातचीत में शामिल नहीं होगा। ऐसे में सवाल उठता है—जब मीटिंग ही नहीं होनी, तो ये सुरक्षा किसके लिए?

डिप्लोमेसी फेल: मेहमान ने आने से किया इनकार

कूटनीतिक गलियारों में इसे पाकिस्तान की बड़ी नाकामी माना जा रहा है। ईरान के इनकार के बाद भी तैयारियां जारी रहीं और शहर को लॉक कर दिया गया। पाकिस्तान ने मध्यस्थ बनने की कोशिश की, लेकिन जब दोनों पक्षों में से एक ने ही मना कर दिया, तो पूरी रणनीति ढह गई। बिसात तो बिछाई गई थी, लेकिन खिलाड़ी ही मैदान छोड़ गए।

कंटेनर, बैरिकेड और सन्नाटा

इस्लामाबाद की सड़कों पर अब ट्रैफिक नहीं, बल्कि कंटेनर और बैरिकेड नजर आते हैं। जगह-जगह पुलिस और सुरक्षाबल तैनात हैं। आम लोग घरों में सीमित हो गए हैं और पूरा शहर किसी सैन्य छावनी जैसा महसूस हो रहा है। ये माहौल सुरक्षा से ज्यादा नियंत्रण का संकेत देता है।

स्कूल-दफ्तर बंद: जनता क्यों भुगते?

20 अप्रैल को सरकारी दफ्तरों को बंद कर दिया गया और कर्मचारियों को वर्क फ्रॉम होम दे दिया गया। इतना ही नहीं, स्कूल और कॉलेज भी बंद कर दिए गए। बच्चों की पढ़ाई रुकी, रोजमर्रा की जिंदगी थम गई। सवाल यही है—जब कोई बड़ा कार्यक्रम ही नहीं हो रहा, तो आम जनता को ये पाबंदियां क्यों झेलनी पड़ रही हैं?

रणनीति या छटपटाहट?

Shehbaz Sharif सरकार की मंशा साफ थी—US-ईरान तनाव के बीच mediator बनकर अपनी अंतरराष्ट्रीय साख को मजबूत करना। लेकिन जब प्लान ही फेल हो गया, तो अब ये कदम रणनीति से ज्यादा छटपटाहट नजर आता है। ऐसे फैसले अक्सर तब लिए जाते हैं जब सरकार दबाव में होती है और कोई रास्ता नहीं सूझता।

ग्लोबल गेम का साइड इफेक्ट

Israel, Iran और United States के बीच बढ़ते तनाव ने पहले ही वैश्विक राजनीति को हिला दिया है। पाकिस्तान ने इस मौके को अवसर में बदलने की कोशिश की, लेकिन ये दांव उल्टा पड़ गया। ग्लोबल पॉलिटिक्स में एंट्री आसान है, लेकिन वहां टिकना हर किसी के बस की बात नहीं।

शहर बंद, साख भी?

आज इस्लामाबाद सिर्फ एक बंद शहर नहीं, बल्कि एक सवाल बन चुका है। क्या ये सिर्फ सुरक्षा का मामला है या कूटनीतिक असफलता को छुपाने की कोशिश? सच ये है कि जब मंच तैयार हो और कलाकार ही न आएं, तो शो नहीं—तमाशा बनता है। और फिलहाल, इस्लामाबाद उसी तमाशे का केंद्र बन गया है।

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