लखनऊ: उत्तर प्रदेश में कांग्रेस ने आराधना मिश्रा ‘मोना’ को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर संगठन की कमान ऐसे नेता को सौंपी है, जिसकी राजनीतिक जड़ें लंबे समय से पार्टी के भीतर ही रही हैं। मोना के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद कांग्रेस के संगठन में एक महत्वपूर्ण बदलाव यह दिखता है कि पार्टी को अब ऐसा चेहरा मिला है, जिसकी राजनीति सीधे कांग्रेस की संगठनात्मक परंपरा और पारिवारिक राजनीतिक विरासत से जुड़ी है। आराधना मिश्रा तीन बार रामपुर खास से विधायक रह चुकी हैं और लंबे समय से कांग्रेस विधानमंडल दल की नेता के तौर पर विधानसभा में पार्टी का प्रतिनिधित्व करती रही हैं।
कांग्रेस के प्रदेश नेतृत्व में हाल के वर्षों में ऐसे चेहरे भी रहे हैं, जिनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि पार्टी से बाहर की रही। राज बब्बर कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष रहे, अजय लल्लू ने भी प्रदेश संगठन की कमान संभाली और अजय राय भी भाजपा छोड़कर कांग्रेस में आए थे। ऐसे राजनीतिक दौर के बाद मोना की नियुक्ति इसलिए अलग दिखाई देती है क्योंकि उनका राजनीतिक सफर कांग्रेस संगठन के भीतर से आगे बढ़ा है।
बाहर से आए चेहरों के दौर के बाद ‘घर’ से निकली नेता
मोना की राजनीति की शुरुआत प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी से नहीं हुई। उन्होंने पहले सामाजिक गतिविधियों के जरिए सार्वजनिक जीवन में कदम रखा और बाद में स्थानीय शासन से राजनीति को आगे बढ़ाया। वर्ष 2000 से वे उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी की सदस्य रही हैं। 2012 के विधानसभा चुनाव के दौरान पार्टी की मीडिया अभियान समिति में भी उन्होंने काम किया था।
इसके बाद रामपुर संग्रामगढ़ ब्लॉक की राजनीति में सक्रिय रहते हुए उन्होंने 2002-07, 2007-12 और 2012-14 तक लगातार तीन बार निर्विरोध ब्लॉक प्रमुख के रूप में जिम्मेदारी संभाली। यानी प्रदेश संगठन की कमान मिलने से पहले उनके पास स्थानीय राजनीति से लेकर विधानसभा और संगठन तक का लंबा अनुभव मौजूद रहा है।
पिता की विरासत, लेकिन अपना लंबा राजनीतिक सफर
आराधना मिश्रा की राजनीतिक पहचान उनके पिता प्रमोद तिवारी की विरासत से जरूर जुड़ी है, लेकिन उनका अपना राजनीतिक सफर भी लंबा रहा है। प्रमोद तिवारी रामपुर खास से लगातार नौ बार विधायक रहे और यह सीट लंबे समय से कांग्रेस के प्रभाव वाले क्षेत्र के रूप में जानी जाती है। वर्ष 2013 में उनके राज्यसभा जाने के बाद रामपुर खास सीट पर हुए उपचुनाव में मोना ने पहली बार चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की। इसके बाद 2017 और 2022 में भी उन्होंने यह सीट कांग्रेस के पास बनाए रखी।
2022 के विधानसभा चुनाव में मोना ने भाजपा उम्मीदवार को 14,741 वोटों के अंतर से हराया था। वर्ष 2019 से वे उत्तर प्रदेश विधानसभा में कांग्रेस विधानमंडल दल की नेता के तौर पर पार्टी की आवाज उठाती रही हैं। विधानसभा में उनकी यह भूमिका अब प्रदेश संगठन की जिम्मेदारी के साथ और व्यापक हो गई है।
मोना के सामने अब रामपुर खास नहीं, पूरा उत्तर प्रदेश
यहीं से मोना के राजनीतिक सफर का सबसे बड़ा बदलाव शुरू होता है। रामपुर खास में कांग्रेस की मजबूत पारिवारिक राजनीतिक जमीन और लगातार चुनावी सफलता एक अलग तरह का अनुभव है, जबकि पूरे उत्तर प्रदेश में पार्टी संगठन को संभालना कहीं व्यापक जिम्मेदारी है।
2027 के विधानसभा चुनाव से पहले उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है। पार्टी ने इसी संगठनात्मक फेरबदल में इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष और देविंदर निषाद तथा आलोक प्रसाद को वरिष्ठ उपाध्यक्ष बनाया है। इससे साफ है कि प्रदेश संगठन में नेतृत्व की जिम्मेदारियों का दायरा भी बढ़ाया गया है।
कांग्रेस की पुरानी जड़ों से निकला चेहरा, अब प्रदेश स्तर पर परीक्षा
मोना की नियुक्ति को सिर्फ नेतृत्व परिवर्तन के तौर पर देखना पर्याप्त नहीं होगा। उनके सामने सबसे बड़ी जिम्मेदारी रामपुर खास की राजनीतिक शैली और संगठनात्मक अनुभव को पूरे प्रदेश में लागू करने की होगी। जिस कांग्रेस के लिए लंबे समय से प्रदेश में मजबूत संगठन और जनाधार वापस हासिल करना चुनौती रहा है, उसके लिए अब मोना की भूमिका विधानसभा की राजनीति से निकलकर संगठन के हर स्तर तक पहुंचने वाली है।
उनका राजनीतिक सफर स्थानीय शासन से शुरू होकर विधानसभा तक पहुंचा और अब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के पद तक आया है। ऐसे में मोना की नई जिम्मेदारी उनके लिए भी एक बड़ा विस्तार है और कांग्रेस संगठन के लिए भी एक नई परीक्षा।
कांग्रेस के लिए ‘अपना चेहरा’ कितना बड़ा बदलाव?
मोना के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद कांग्रेस के सामने अब एक ऐसा चेहरा है, जिसकी राजनीतिक पहचान पार्टी के भीतर लंबे समय से बनी है। उनके पिता प्रमोद तिवारी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं, जबकि मोना स्वयं वर्षों से कांग्रेस संगठन, विधानसभा और स्थानीय राजनीति में सक्रिय रही हैं। विधानसभा में उनकी लगातार मौजूदगी और रामपुर खास से तीन चुनावी जीत उनके राजनीतिक सफर के महत्वपूर्ण पड़ाव हैं।
यही वजह है कि मोना की ताजपोशी को कांग्रेस के लिए केवल एक पद परिवर्तन नहीं, बल्कि संगठन की कमान पार्टी की अपनी राजनीतिक पृष्ठभूमि से निकले चेहरे को सौंपने के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि अब असली सवाल यह है कि रामपुर खास से बनी उनकी राजनीतिक पकड़ और संगठनात्मक अनुभव उत्तर प्रदेश के व्यापक राजनीतिक मैदान में कांग्रेस के लिए किस तरह काम करता है।
