नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘दिमागी नक्सल’ वाले बयान के बाद इस मुद्दे पर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। इसी बीच कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) की नेता और पार्टी की कानूनी मामलों की प्रमुख रत्ना सिंह ने सोशल मीडिया पर एक ऐसी अपील की है, जिसने अभिजीत दीपके के पुराने ‘कॉकरोच फॉर्मूले’ की याद ताजा कर दी है। रत्ना सिंह ने सवाल किया, ‘क्या होगा यदि सारे दिमागी नक्सल एक साथ आ जाएं?’
अभिजीत दीपके के सवाल से शुरू हुआ था ‘कॉकरोच फॉर्मूला’
रत्ना सिंह ने जिस पंक्ति का इस्तेमाल किया, वही सवाल पहले अभिजीत दीपके ने ‘कॉकरोच’ को लेकर उठाया था। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत के एक बयान में कथित तौर पर ‘कॉकरोच’ शब्द के इस्तेमाल के बाद दीपके ने सोशल मीडिया पर पूछा था, ‘क्या होगा यदि सारे कॉकरोच एक साथ आ जाएं?’
इस सवाल पर सोशल मीडिया पर व्यापक प्रतिक्रिया देखने को मिली। इसके बाद ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ नाम से सोशल मीडिया हैंडल बनाया गया। खबर के मुताबिक, कुछ ही दिनों में इस हैंडल की लोकप्रियता तेजी से बढ़ी और इसके फॉलोअर्स की संख्या कांग्रेस और भाजपा जैसे प्रमुख राजनीतिक दलों के सोशल मीडिया फॉलोअर्स से भी आगे निकल गई।
रत्ना सिंह ने ‘दिमागी नक्सल’ को लेकर उठाया वही सवाल
15 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बयान के बाद रत्ना सिंह ने सोशल मीडिया पर ‘दिमागी नक्सल’ को लेकर वही अंदाज अपनाया। उन्होंने लिखा, ‘क्या होगा यदि सारे दिमागी नक्सल एक साथ आ जाएं?’
उनके इस सवाल पर सोशल मीडिया यूजर्स की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आईं। कुछ लोगों ने इसका विरोध किया, जबकि कुछ यूजर्स ने इसे समर्थन के तौर पर लिया। कई लोगों ने सवाल के जवाब में भाजपा समर्थकों, राष्ट्रवादियों और संघ समर्थकों के एकजुट होने की स्थिति को लेकर भी सवाल उठाए।
सोशल मीडिया पर लोगों ने दिए अलग-अलग जवाब
रत्ना सिंह की पोस्ट पर कई लोगों ने अपनी प्रतिक्रिया दी। एक यूजर ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि सभी ‘दिमागी नक्सल’ एक साथ आते हैं तो उनके खिलाफ एक साथ राष्ट्रव्यापी कार्रवाई की जा सकती है। वहीं एक अन्य यूजर ने इसे जंगल में सक्रिय नक्सलियों से जोड़ते हुए टिप्पणी की।
कुछ अन्य यूजर्स ने सवाल का रुख बदलते हुए पूछा कि यदि सभी भाजपा समर्थक, राष्ट्रवादी या संघ समर्थक एकजुट हो जाएं तो क्या होगा। वहीं कुछ लोगों ने ‘दिमागी नक्सल’ शब्द को लेकर आपत्ति जताते हुए कहा कि सरकार से सवाल पूछना किसी को नक्सली नहीं बनाता।
पीएम मोदी ने लाल किले से ‘दिमागी नक्सल’ पर क्या कहा था?
देश के 80वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से अपने संबोधन में ‘दिमागी नक्सल’ शब्द का इस्तेमाल किया था। उन्होंने कहा था कि सशस्त्र नक्सलवाद का खतरा अब समाप्ति की ओर है, लेकिन ऐसी सोच रखने वाले कुछ लोग हिंसा और अशांति फैलाने के अवसर तलाश रहे हैं।
प्रधानमंत्री ने कहा था कि ऐसे लोगों की पहचान कर उन्हें अलग-थलग करने की जरूरत है। उन्होंने युवाओं को मुख्यधारा से जोड़ने पर भी जोर दिया था।
CJP ने युवाओं के प्रदर्शन से जोड़ा पीएम का बयान
कॉकरोच जनता पार्टी ने प्रधानमंत्री के इस बयान को युवाओं के प्रदर्शन से जोड़ते हुए सवाल उठाए हैं। पार्टी के सह संयोजक सौरभ दास ने सोशल मीडिया पर कहा कि केवल सरकार से सवाल पूछने के कारण पढ़े-लिखे युवाओं को नक्सली नहीं कहा जा सकता।
दास ने प्रधानमंत्री के बयान पर आपत्ति जताते हुए कहा कि युवाओं की समस्याओं को समझने और उनका समाधान करने की जरूरत है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार से सवाल पूछने वाले युवाओं को ‘दिमागी नक्सल’ कहना उचित नहीं है।
‘कॉकरोच फॉर्मूले’ से ‘दिमागी नक्सल’ तक पहुंची सियासी बहस
रत्ना सिंह की टिप्पणी के बाद ‘दिमागी नक्सल’ को लेकर चल रही बहस अब सोशल मीडिया पर भी तेज होती दिखाई दे रही है। CJP ने अभिजीत दीपके के पुराने सवाल के पैटर्न को अपनाते हुए इस मुद्दे पर समर्थकों को एकजुट करने की कोशिश की है। आने वाले दिनों में इस अपील का राजनीतिक और सोशल मीडिया पर क्या असर पड़ता है, यह देखना महत्वपूर्ण होगा।
