शिवलिंग पर शंख से जल क्यों नहीं चढ़ाया जाता? जानिए शंखचूड़ की कथा और इसके पीछे की धार्मिक मान्यता

नई दिल्ली: सनातन धर्म में शंख को अत्यंत शुभ और पवित्र माना गया है। पूजा-पाठ, यज्ञ और मांगलिक कार्यों में शंख का विशेष महत्व है। मान्यता है कि शंख बजाने से वातावरण शुद्ध होता है और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है। हालांकि, जहां भगवान विष्णु को शंख से जल अर्पित किया जाता है, वहीं भगवान शिव के शिवलिंग पर शंख से जल चढ़ाना वर्जित माना गया है। इसके पीछे एक पौराणिक कथा प्रचलित है।

शंखचूड़ के वध से जुड़ी है मान्यता

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, एक दैत्यराज ने संतान प्राप्ति के लिए भगवान विष्णु की कठोर तपस्या की। प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उसे वरदान दिया, जिसके फलस्वरूप शंखचूड़ नामक पुत्र का जन्म हुआ। आगे चलकर शंखचूड़ ने तीनों लोकों पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया, जिससे देवता अत्यंत परेशान हो गए।

इसके बाद सभी देवता भगवान शिव की शरण में पहुंचे। देवताओं की प्रार्थना स्वीकार करते हुए भगवान शिव ने शंखचूड़ से युद्ध किया और अपने त्रिशूल से उसका वध कर दिया।

इसी वजह से शिवलिंग पर शंख से नहीं होता अभिषेक

धार्मिक मान्यता के अनुसार, शंखचूड़ की हड्डियों से ही शंख की उत्पत्ति हुई थी। इसी कारण शंख को शंखचूड़ का प्रतीक माना जाता है। यही वजह है कि भगवान शिव पर शंख से जल अर्पित करना शुभ नहीं माना जाता। इस मान्यता का उल्लेख शिवपुराण की रुद्र संहिता में भी बताया जाता है, जिसके आधार पर शिवलिंग का अभिषेक शंख से नहीं किया जाता।

पूजा में शंख का महत्व क्यों माना गया है?

सनातन परंपरा में शंख को पूजा का महत्वपूर्ण अंग माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि पूजा के दौरान शंखनाद करने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और वातावरण पवित्र बनता है। साथ ही, इसकी ध्वनि नकारात्मकता को दूर करने वाली मानी जाती है।

समुद्र मंथन से निकले 14 रत्नों में शामिल है शंख

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शंख की उत्पत्ति समुद्र मंथन के दौरान निकले 14 रत्नों में से एक के रूप में हुई थी। यही कारण है कि इसे भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का प्रिय माना जाता है। मान्यता है कि पूजा में शंख का उपयोग करने से शुभ फल की प्राप्ति होती है और घर में सकारात्मक वातावरण बना रहता है।

 

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