नई दिल्ली: दिल्ली सरकार ने पानी और सीवर इंफ्रास्ट्रक्चर शुल्क को लेकर बड़ा जनहित फैसला लिया है। नई व्यवस्था के तहत अब जल बोर्ड का इंफ्रास्ट्रक्चर चार्ज संपत्ति की वास्तविक जल आवश्यकता के आधार पर तय किया जाएगा। पहले पूरे प्रिमाइसेस के आधार पर शुल्क लिया जाता था, लेकिन अब लोगों को बड़ी राहत देते हुए इस प्रणाली में बदलाव किया गया है।
सरकार के मुताबिक नए नियमों के तहत इंफ्रास्ट्रक्चर चार्ज केवल नए निर्माण या अतिरिक्त निर्माण पर ही लागू होगा। यदि किसी भवन का पुनर्निर्माण किया जाता है और उसकी जल आवश्यकता नहीं बढ़ती है, तो दोबारा शुल्क नहीं लिया जाएगा।
E-F कॉलोनियों में 50% और G-H में 70% तक राहत
नई नीति के तहत नॉन-एफएआर और खुले क्षेत्रों को इंफ्रास्ट्रक्चर चार्ज की गणना में शामिल नहीं किया जाएगा। इसके साथ ही E और F श्रेणी की कॉलोनियों में इंफ्रास्ट्रक्चर चार्ज पर 50 प्रतिशत की छूट दी जाएगी, जबकि G और H श्रेणी की कॉलोनियों में 70 प्रतिशत तक राहत मिलेगी।
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह शुल्क केवल 200 वर्ग मीटर से अधिक क्षेत्रफल वाले भूखंडों पर ही लागू होगा।
अनधिकृत कॉलोनियों को भी मिलेगा फायदा
नई व्यवस्था के तहत अनधिकृत कॉलोनियों में पंजीकृत वास्तुकारों द्वारा स्वीकृत नक्शों को मान्यता दी जाएगी। इससे लोगों को निर्माण स्वीकृति और शुल्क प्रक्रिया में आसानी मिलेगी और लंबी प्रशासनिक दिक्कतों से राहत मिलने की उम्मीद है।
धार्मिक संस्थानों और ZLD सिस्टम को अतिरिक्त राहत
दिल्ली सरकार ने सामाजिक और पर्यावरणीय पहलुओं को ध्यान में रखते हुए कई विशेष छूट भी दी हैं। आयकर अधिनियम की धारा 12AB के तहत पंजीकृत संस्थानों और धार्मिक स्थलों को 50 प्रतिशत अतिरिक्त छूट मिलेगी।
इसके अलावा जिन व्यावसायिक और संस्थागत परिसरों में जीरो सीवरेज डिस्चार्ज (ZLD) सिस्टम और मानकों के अनुरूप सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट संचालित हैं, उन्हें भी सीवर इंफ्रास्ट्रक्चर शुल्क में 50 प्रतिशत की छूट दी जाएगी।
हालांकि सरकार ने साफ किया है कि यदि ZLD प्रणाली बंद या निष्क्रिय पाई गई तो यह छूट तत्काल खत्म कर दी जाएगी और प्रतिदिन 0.5 प्रतिशत का जुर्माना भी लगाया जाएगा।
नई नीति से लाखों रुपये की बचत
नई नीति के लागू होने के बाद इंफ्रास्ट्रक्चर शुल्क में भारी कमी आएगी। उदाहरण के तौर पर A और B श्रेणी की कॉलोनियों में 200 वर्ग मीटर से अधिक भूखंड वाली 300 FAR की चार मंजिला संपत्ति पर पहले जहां करीब 13.18 लाख रुपये शुल्क देना पड़ता था, अब यह घटकर लगभग 5.4 लाख रुपये रह जाएगा।
इसी तरह E और F श्रेणी में यही शुल्क लगभग 2.7 लाख रुपये और G तथा H श्रेणी में करीब 1.62 लाख रुपये रह जाएगा।
औद्योगिक संपत्तियों को भी बड़ी राहत मिली है। 1000 वर्ग मीटर की औद्योगिक संपत्ति पर पहले जहां करीब 57.67 लाख रुपये तक शुल्क देना पड़ता था, अब यह घटकर लगभग 8.91 लाख रुपये हो जाएगा।
सरकार बोली- लोगों को मिलेगी पारदर्शी और सरल व्यवस्था
दिल्ली सरकार का कहना है कि इस फैसले का उद्देश्य लोगों को पारदर्शी, सरल और राहतभरी व्यवस्था उपलब्ध कराना है। नई नीति से मकान मालिकों, बिल्डर्स और संस्थागत संपत्तियों को सीधा लाभ मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।
