
पटना की सत्ता में कुर्सियां कम हैं, दावेदार ज्यादा। सरकार बन गई, मुख्यमंत्री शपथ ले चुके, लेकिन मंत्री पद अब भी इंतजार में हैं। सवाल सिर्फ इतना नहीं कि विस्तार कब होगा… सवाल ये है कि किसका राजनीतिक भविष्य खुलेगा और किसका सपना टूटेगा?
15 अप्रैल को सम्राट चौधरी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। तब से बिहार की राजनीति में एक ही चर्चा है—नई सरकार का असली चेहरा कब सामने आएगा?
अब NDA सूत्रों की मानें तो मई के पहले हफ्ते में कैबिनेट विस्तार तय माना जा रहा है। बंगाल समेत पांच राज्यों के नतीजे 4 मई को आएंगे, और उसके बाद बिहार में सत्ता का नया गणित लिखा जाएगा।
बिहार में मौसम गर्मी का है… लेकिन पसीना नेताओं को आ रहा है।
सिर्फ तीन चेहरों पर चल रही सरकार
अभी बिहार सरकार तीन बड़े चेहरों के भरोसे चल रही है—मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और दो डिप्टी सीएम विजय सिन्हा व बिजेंद्र यादव। यानी विभागों का पहाड़ तीन कंधों पर टिका है। फाइलें बढ़ रही हैं, फैसले अटक रहे हैं, और सहयोगी दलों का धैर्य जवाब दे रहा है। ऐसे में विस्तार अब राजनीतिक विकल्प नहीं, प्रशासनिक मजबूरी बन चुका है।
नीतीश सरकार में 27 सदस्यीय कैबिनेट थी। संविधान के हिसाब से बिहार में मुख्यमंत्री समेत 36 मंत्री बन सकते हैं। यानी अभी भी करीब 9 पद खाली हैं।
खाली कुर्सियां कभी खाली नहीं रहतीं… उन पर सबसे पहले महत्वाकांक्षा बैठती है।
सम्राट चौधरी की पहली असली परीक्षा
मुख्यमंत्री बनना आसान हिस्सा था। अपनी टीम चुनना असली इम्तिहान है। सम्राट चौधरी के सामने चुनौती सिर्फ मंत्री बनाना नहीं, बल्कि हर दल, हर जाति, हर क्षेत्र और हर नाराज चेहरे को साधना है। अगर एक नाम छूटा, तो दूसरा गुट नाराज। अगर पुराने चेहरे लौटे, तो नए चेहरे बगावत करेंगे। अगर नए चेहरे आए, तो पुराने नेता चुप नहीं बैठेंगे। यही वजह है कि कैबिनेट सूची पर माथापच्ची अंतिम दौर में है।
भाजपा-जदयू का अदृश्य संघर्ष
ऊपर से सब शांत दिख रहा है। अंदर से सीटों का शतरंज चल रहा है। पहले मुख्यमंत्री पद जदयू के पास था, अब भाजपा के पास है। इससे समीकरण बदल चुके हैं। सूत्र बताते हैं कि जदयू अब दो डिप्टी सीएम पदों और कुछ अहम विभागों के जरिए अपना वजन बनाए रखना चाहती है। वहीं भाजपा सत्ता की कमान हाथ में लेकर मंत्रालयों में भी मजबूत पकड़ चाहती है।
यानी सवाल सिर्फ विभागों का नहीं… इज्जत के अनुपात का है। गठबंधन में मुस्कान जितनी बड़ी होती है, अंदर उतनी ही बड़ी खींचतान होती है।
छोटे दल भी खेल बिगाड़ सकते हैं
चिराग पासवान की लोजपा-आर, जीतन राम मांझी की हम, और उपेंद्र कुशवाहा की रालोमो—ये संख्या में छोटे हैं, लेकिन राजनीति में भारी हैं। ऐसे दलों को नजरअंदाज करना NDA के लिए जोखिम होगा। पुराने मंत्रियों की वापसी की चर्चा है, क्योंकि इन दलों में नेतृत्व स्पष्ट है। लेकिन अगर इन्हें कम महत्व मिला, तो संदेश खराब जाएगा—खासकर चुनावी सालों के पहले। बिहार में गठबंधन गणित सिर्फ सीटों से नहीं, प्रतीकों से चलता है।
जातीय समीकरण सबसे बड़ा फॉर्मूला
बिहार की राजनीति में जाति कोई फुटनोट नहीं, मुख्य अध्याय है। सम्राट चौधरी और भाजपा दोनों जानते हैं कि 2027 की लड़ाई अभी से शुरू हो चुकी है। इसलिए कैबिनेट में हर वर्ग को प्रतिनिधित्व देना जरूरी है—अति पिछड़ा, दलित, सवर्ण, यादव विरोधी समीकरण, महादलित, महिला चेहरा, युवा चेहरा—सबकी जरूरत है। कुछ पुराने मंत्रियों का पत्ता कट सकता है ताकि fresh और aggressive चेहरों को मौका मिले।
बिहार में मंत्री वही नहीं बनता जो सक्षम हो… कई बार वही बनता है जो समीकरण पूरा करे।
नितिन नवीन फैक्टर भी अहम
भाजपा के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के प्रमोशन के बाद एक बड़ी राजनीतिक जगह खाली हुई है। अब पार्टी उस खालीपन को भरने के लिए किसी मजबूत चेहरे की तलाश में है। यह सिर्फ मंत्री पद नहीं होगा, बल्कि संदेश होगा कि भाजपा बिहार में किस पीढ़ी को आगे बढ़ा रही है। युवा बनाम अनुभव—यह बहस भी सूची तय करेगी।
जनता क्यों देख रही है ये ड्रामा?
क्योंकि मंत्री बनते ही न सिर्फ गाड़ी बदलती है, फैसले भी बदलते हैं। किस जिले को फंड मिलेगा? किस सड़क का टेंडर पास होगा?
किस अस्पताल की फाइल आगे बढ़ेगी? किस अफसर की पोस्टिंग होगी? कैबिनेट विस्तार सिर्फ नेताओं की जीत-हार नहीं, जनता के विकास की दिशा भी तय करता है। लेकिन जनता यह भी जानती है—कई बार मंत्रालय सेवा नहीं, सिर्फ सत्ता का मेडल बन जाता है।
4 मई क्यों है निर्णायक?
बंगाल समेत पांच राज्यों के चुनाव नतीजे 4 मई को आने हैं। NDA पहले राष्ट्रीय माहौल देखेगा, फिर बिहार की सूची फाइनल करेगा। अगर नतीजे अच्छे आए, तो आत्मविश्वास के साथ बड़े फैसले होंगे। अगर झटका लगा, तो बिहार में चेहरे बदलकर नया संदेश दिया जा सकता है।यानी पटना की राजनीति पर असर कोलकाता तक से पड़ेगा। दिल्ली की हवा बदले तो पटना की कुर्सियां हिल जाती हैं।
सरप्राइज होगा या रिपीट शो?
अब नजर एक ही चीज़ पर है—क्या सम्राट चौधरी bold फैसले लेंगे? क्या पुराने चेहरे हटेंगे? क्या कोई युवा नेता एंट्री करेगा? क्या भाजपा जदयू पर भारी पड़ेगी? क्या छोटे दलों को सम्मान मिलेगा? या फिर जनता को वही पुरानी टीम नए पैकिंग में दिखेगी?
चेतावनी समझिए
बिहार में कैबिनेट विस्तार सिर्फ शपथ ग्रहण नहीं होगा। यह 2027 की पहली टेस्ट मैच टीम शीट होगी। जो आज मंत्री बनेगा, वही कल चेहरा होगा। जो आज छूटेगा, वही कल बगावत करेगा। सम्राट चौधरी के लिए यह कुर्सी संभालने का नहीं, कुर्सी बचाने का पहला इम्तिहान है।
और बिहार की राजनीति का नियम साफ है— यहां सरकारें विपक्ष से कम, अपनों से ज्यादा डरती हैं।
“50 हेलीकॉप्टर बनाम 3! ममता का वार—‘बाहरी ताकतें नहीं जीतेंगी बंगाल’”
