
सिविल लाइन की उन शांत गलियों को क्या पता था कि आज वहां ‘मंजुल’ के बहाने शिक्षा के भविष्य का नया स्क्रिप्ट लिखा जाने वाला है। जब ‘गैंग्स ऑफ वसेपुर’ के लेखक और अभिनेता जीशान कादरी स्टेज पर चढ़े, तो माहौल सिर्फ तालियों का नहीं, बल्कि उन उम्मीदों का था जो अक्सर छोटे शहरों के क्लासरूम में दम तोड़ देती हैं।
क्या हमने कभी सोचा है कि हमारे बच्चे सिर्फ मार्कशीट छापने वाली मशीन हैं या उनमें कोई ‘जीशान’ भी छिपा है? दीप प्रज्ज्वलन तो एक रस्म थी, असली आग तो तब लगी जब कादरी ने सीधे पेरेंट्स की आंखों में आंखें डालकर कहा—”पढ़ाई बोझ नहीं है, उसे बच्चे की पसंद का ईंधन बनाओ।”
40 साल का सफर और अब CBSE का ‘यू-टर्न’
गोंडा जनपद में पिछले 4 दशक से शिक्षा की मशाल थामे खड़ा सिटी मॉन्टेसरी इंटर कॉलेज अब अपनी खाल बदल रहा है। यूपी बोर्ड से सालों का नाता तोड़कर अब यह संस्थान CBSE की तरफ कदम बढ़ा रहा है। प्रबंधक शाश्वत जोशी का यह फैसला कोई अचानक लिया गया स्टेप नहीं है, बल्कि गोंडा की उस जरूरत का जवाब है जिसे सिस्टम सालों से अनसुना कर रहा था।
सवाल यह है कि क्या सिर्फ बोर्ड बदल लेने से शिक्षा का स्तर बदल जाएगा? जोशी का दावा है कि यह ‘छात्र हित’ में है। लेकिन असल चुनौती उन 40 सालों की विरासत को आधुनिकता के सांचे में ढालने की है। अब यहां सिर्फ किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि हाई-क्वॉलिटी एक्टिविटीज और ट्रेनिंग का तड़का भी लगेगा।
मंच पर सतरंगी सपने और सिस्टम को आईना
वार्षिकोत्सव ‘मंजुल’ में जब नन्हे कलाकारों ने परफॉर्म किया, तो वहां बैठे लोगों आंखों में चमक थी। ट्रस्टी प्रवृत्ति जोशी, रश्मि जोशी और अध्यक्ष आशीष मिश्रा जैसे दिग्गजों की मौजूदगी ने यह साफ कर दिया कि यह स्कूल सिर्फ एक बिल्डिंग नहीं, बल्कि गोंडा का एक इमोशन है। झंझरी ब्लॉक प्रमुख जावेद सईद और जीशान हैदर जैसे नामों का जुड़ना बताता है कि मामला अब सिर्फ होमवर्क तक सीमित नहीं रहा।
प्रधानाचार्य ए.के. मिश्रा और उनकी टीम—जिसमें विवेक, पल्लवी, और मनीषा जैसे नाम शामिल हैं—ने जो माहौल तैयार किया, वह किसी फिल्मी सेट से कम नहीं था।
“तालियां उन बच्चों के लिए नहीं, बल्कि उस उम्मीद के लिए बजीं जो इस पुराने स्कूल की नई दीवारों से झांक रही है।”
क्या गोंडा तैयार है इस ‘एजुकेशनल शिफ्ट’ के लिए?
सूरज होटल के पास, बहराइच रोड पर स्थित यह स्कूल अब एक नए अवतार में है। 40 साल तक यूपी बोर्ड की चक्की में पिसने के बाद, अब CBSE का रास्ता चुनना यह बताता है कि पेरेंट्स की डिमांड बदल चुकी है। वे अब सिर्फ रट्टा मारने वाला बच्चा नहीं, बल्कि कॉन्फिडेंट लीडर चाहते हैं।
शाश्वत जोशी का यह विजन अगर जमीन पर उतरा, तो गोंडा की शिक्षा व्यवस्था में यह एक बड़ा मील का पत्थर साबित होगा।
जीशान कादरी ने जो चिंगारी सुलगाई है, वह हर घर तक पहुंचनी चाहिए। शिक्षा का मतलब डिग्री बांटना नहीं, बल्कि व्यक्तित्व गढ़ना है। सिटी मॉन्टेसरी ने अपना दांव खेल दिया है, अब गेंद पेरेंट्स के पाले में है। क्या आप तैयार हैं अपने बच्चे को उस सांचे से बाहर निकालने के लिए?
याद रखिएगा, अगर आज हमने बच्चों की ‘रुचि’ को नहीं पहचाना, तो कल वे सिर्फ भीड़ का हिस्सा बनकर रह जाएंगे। गोंडा बदल रहा है, पर क्या आप अपनी सोच बदलने को तैयार हैं?
28 जहाज डुबोए या बयानबाज़ी का बम? होर्मुज पर हाई वोल्टेज ड्रामा!
