कांशीराम जयंती में पहुंचे राहुल, माया बोली- इतिहास भूलकर वोट मत मांगिए

गौरव त्रिपाठी
गौरव त्रिपाठी

भारतीय राजनीति का पुराना गणित कहता है—दिल्ली की कुर्सी का रास्ता उत्तर प्रदेश और बिहार से होकर गुजरता है। यही वजह है कि जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आते हैं, नेताओं के कदम भी इन राज्यों की जमीन पर तेजी से पड़ने लगते हैं। लेकिन कभी-कभी राजनीतिक दांव ऐसा उल्टा पड़ जाता है कि जिस चाल से तालियां मिलने की उम्मीद होती है, वही चाल सवालों के घेरे में आ जाती है। राजधानी लखनऊ में कांशीराम जयंती के कार्यक्रम में राहुल गांधी की मौजूदगी के बाद कुछ ऐसा ही सियासी तूफान खड़ा हो गया।

दलित राजनीति में अचानक तेज हुई हलचल

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष Rahul Gandhi हाल ही में उत्तर प्रदेश पहुंचे और बहुजन आंदोलन के प्रमुख नेता Kanshi Ram की जयंती के कार्यक्रम में शामिल हुए।

राजनीतिक गलियारों में इसे कांग्रेस की उस कोशिश के तौर पर देखा गया, जिसके जरिए पार्टी दलित वोट बैंक में अपनी मौजूदगी मजबूत करना चाहती है। लेकिन यह कदम उम्मीद के मुताबिक सियासी फायदा नहीं दे सका।

मायावती का तीखा पलटवार

बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो Mayawati ने राहुल गांधी के इस कदम पर तीखी प्रतिक्रिया दी।

उन्होंने कहा कि जब कांशीराम का निधन हुआ था, तब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी, लेकिन उस समय एक दिन का भी राष्ट्रीय शोक घोषित नहीं किया गया।

मायावती ने तंज कसते हुए कहा कि “जिस पार्टी ने बहुजन आंदोलन के नेताओं को कभी सम्मान नहीं दिया, वह आज उनके नाम पर राजनीति करने की कोशिश कर रही है।”

कांग्रेस पर इतिहास के सवाल

मायावती ने सिर्फ कांशीराम का मुद्दा नहीं उठाया, बल्कि कांग्रेस के लंबे राजनीतिक इतिहास को भी कटघरे में खड़ा किया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने वर्षों तक सत्ता में रहते हुए B. R. Ambedkar को भी उचित सम्मान नहीं दिया और उन्हें भारत रत्न से सम्मानित करने में भी देर की।

बसपा प्रमुख का कहना था कि अगर कांग्रेस वास्तव में बहुजन नेताओं का सम्मान करती तो इतिहास कुछ और होता।

चुनाव से पहले सियासी समीकरण

उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर सभी दल अपनी रणनीति तैयार कर रहे हैं।

दलित वोट बैंक राज्य की राजनीति में बेहद अहम माना जाता है। ऐसे में हर पार्टी इस सामाजिक समूह के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है। लेकिन इस सियासी रस्साकशी में बयानबाजी का स्तर भी तेजी से बढ़ता दिखाई दे रहा है।

विश्लेषकों की नजर में क्या मायने?

राजनीतिक विश्लेषक Surendra Dubey का कहना है, “उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित वोट हमेशा निर्णायक भूमिका निभाता है। इसलिए हर चुनाव से पहले इस समुदाय के प्रतीकों और नेताओं को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो जाती है।”

उन्होंने यह भी कहा कि
“कांग्रेस की कोशिश है कि वह दलित राजनीति में फिर से जगह बनाए, जबकि बसपा इसे अपने कोर वोट बैंक की सुरक्षा के तौर पर देख रही है।”

सियासत का असली संदेश

राजनीति में प्रतीक और प्रतीकवाद का महत्व हमेशा बड़ा रहा है। नेताओं की मौजूदगी, श्रद्धांजलि कार्यक्रम और बयान—सब मिलकर चुनावी संदेश देते हैं। लेकिन यूपी की राजनीति इतनी सरल नहीं है। यहां हर कदम के पीछे इतिहास भी होता है और सामाजिक समीकरण भी।

यही वजह है कि कांशीराम जयंती का यह कार्यक्रम सिर्फ एक श्रद्धांजलि नहीं रहा, बल्कि चुनाव से पहले शुरू हुई सियासी जंग का एक नया अध्याय बन गया।

“रोटी-बेटी-माटी खतरे में!” असम में Modi का कांग्रेस पर सबसे तीखा हमला

Related posts

Leave a Comment