JDU विधायक Nitish Kumar को वोट न दें तब क्या होगा, कुमार इज बैक ?

आलोक सिंह
आलोक सिंह

बिहार की राजनीति अक्सर शतरंज की बिसात जैसी लगती है। यहाँ मोहरे कम और चालें ज्यादा चलती हैं। राज्यसभा चुनाव के बीच अचानक यह चर्चा तेज हो गई कि अगर Nitish Kumar को उनकी ही पार्टी के विधायक पूरा समर्थन न दें तो समीकरण बदल सकते हैं।

सवाल यह नहीं कि हार होगी या नहीं। असल सवाल यह है कि क्या यह भी राजनीति की एक चाल हो सकती है?

क्योंकि बिहार की सियासत में कई बार हार भी कहानी का आखिरी पन्ना नहीं होती। कभी-कभी वही अगले अध्याय की शुरुआत बन जाती है।

राजनीति का गणित: हार भी कभी रणनीति बन जाती है

राजनीति में जीत ही सब कुछ नहीं होती। कभी-कभी हार भी एक संदेश बन जाती है। बिहार की सत्ता में लंबे समय से अहम भूमिका निभा रहे Nitish Kumar को लेकर यह चर्चा इसलिए भी तेज है क्योंकि राज्यसभा चुनाव में हर वोट की कीमत बहुत ज्यादा होती है।

अगर समीकरण थोड़े भी बदल जाएं, तो सियासी गलियारों में हलचल तेज हो जाती है। कई बार ऐसी परिस्थितियां सहानुभूति और नई रणनीति का रास्ता भी खोल देती हैं।

JDU के भीतर की खामोशी

Janata Dal (United) यानी JDU के भीतर इस मुद्दे पर खुलकर बहुत कम लोग बोल रहे हैं। लेकिन सोशल मीडिया और राजनीतिक चर्चाओं में कई तरह की अटकलें घूम रही हैं।

कुछ लोग इसे राजनीतिक रणनीति मान रहे हैं, तो कुछ इसे पार्टी के भीतर की असंतुष्टि का संकेत बताते हैं। सच क्या है, यह शायद वही जानते हैं जो इस सियासी खेल के असली खिलाड़ी हैं।

बिहार की राजनीति का पुराना अनुभव

अगर बिहार की राजनीति का इतिहास देखा जाए, तो यहाँ गठबंधन बदलना, समीकरण बदलना और रणनीति बदलना कोई नई बात नहीं है।

Nitish Kumar को अक्सर एक ऐसे नेता के रूप में देखा जाता है जो समय और परिस्थिति के हिसाब से राजनीतिक कदम उठाते हैं। यही वजह है कि हर नया राजनीतिक संकेत तुरंत चर्चा का विषय बन जाता है।

क्योंकि बिहार में राजनीति सिर्फ खबर नहीं होती…वह हमेशा एक कहानी बन जाती है।

असली सवाल: चाल किस दिशा में?

राज्यसभा चुनाव का परिणाम चाहे जो भी हो, इस बहस ने एक बात जरूर साफ कर दी है। बिहार की राजनीति में हर कदम को सिर्फ घटना नहीं माना जाता। उसे रणनीति की नजर से भी देखा जाता है। और यही वजह है कि जब भी Nitish Kumar का नाम आता है, तो चर्चा सिर्फ राजनीति की नहीं, राजनीतिक शतरंज की होने लगती है।

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