
लखनऊ के लोक भवन में मंगलवार की कैबिनेट बैठक महज एक सरकारी औपचारिकता नहीं थी. यह उस प्रशासनिक स्क्रिप्ट का नया अध्याय था, जहां सरकार ने जमीन माफिया, फर्जीवाड़े और सिस्टम की ढिलाई पर एक साथ कई ताले जड़ने की कोशिश की.
मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे Yogi Adityanath के सामने जब प्रस्तावों की फाइलें खुलीं, तो फैसले सिर्फ कागज पर नहीं रहे. 31 प्रस्तावों की मंजूरी ने प्रशासनिक मशीनरी को एक स्पष्ट संदेश दिया कि अब नियमों का खेल थोड़ा ज्यादा सख्त होने वाला है.
रजिस्ट्री से पहले खतौनी जांच: जमीन के खेल पर पहला ब्रेक
उत्तर प्रदेश में जमीन खरीद-फरोख्त का बाजार अक्सर विवाद और फर्जीवाड़े की खबरों से भरा रहता है. कैबिनेट ने इसी दर्द की नस दबाई. अब किसी भी जमीन की रजिस्ट्री से पहले खतौनी और स्वामित्व दस्तावेजों का सत्यापन अनिवार्य होगा.
यह फैसला सिर्फ एक तकनीकी बदलाव नहीं बल्कि जमीन कारोबार में चल रहे “पेपर मैजिक” पर सीधा हमला है.
राजस्व रिकॉर्ड की पुष्टि के बिना रजिस्ट्री नहीं होगी. मतलब साफ है कि अब कागजों की बाजीगरी से जमीन हथियाने वाले गिरोहों की राह मुश्किल हो सकती है.
प्रशासन का दावा है कि इससे आम नागरिकों की जीवनभर की जमा पूंजी सुरक्षित होगी और भू-माफिया की गतिविधियों पर भी लगाम लगेगी.
12,200 गांवों तक बसें: गांव से शहर की दूरी घटाने की कोशिश
कैबिनेट ने ग्रामीण परिवहन के मोर्चे पर भी बड़ा फैसला लिया. “मुख्यमंत्री ग्राम परिवहन योजना” के तहत लगभग 12,200 दूरदराज गांवों को बस सेवा से जोड़ने की योजना को मंजूरी मिली है.
परिवहन विभाग के अनुसार छोटी और मझोले आकार की 28 सीटों वाली बसें चलाई जाएंगी ताकि संकरी ग्रामीण सड़कों पर भी आसानी से चल सकें.
योजना की खास बातें बसें रात में गांवों तक पहुंचकर वहीं रुकेंगी। सुबह 10 बजे से पहले जिला मुख्यालय के लिए रवाना होंगी। शाम 4 बजे से रात 8 बजे तक गांवों की ओर वापसी। हर गांव में कम से कम दो फेरे।
सरकार का तर्क है कि इससे छात्रों, किसानों और मरीजों को शहर तक पहुंचने में बड़ी राहत मिलेगी.

सरकारी कर्मचारियों पर कड़ी निगरानी
कैबिनेट का तीसरा बड़ा फैसला प्रशासनिक पारदर्शिता से जुड़ा है. अब यदि कोई सरकारी कर्मचारी दो महीने के मूल वेतन से ज्यादा कीमत की चल संपत्ति खरीदता या बेचता है छह महीने के वेतन से ज्यादा राशि शेयर बाजार में निवेश करता है तो उसे इसकी जानकारी संबंधित प्राधिकरण को देना अनिवार्य होगा.
सरकार के मुताबिक यह नियम प्रशासनिक ईमानदारी को मजबूत करेगा और संपत्ति छिपाने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाएगा.
फैसलों के पीछे संदेश क्या है?
राजनीतिक विश्लेषक सुरेंद्र दुबे का कहना है कि इन फैसलों को सिर्फ प्रशासनिक सुधार के रूप में नहीं देखा जा सकता. यह सरकार का वह संकेत भी है जिसमें सिस्टम की पारदर्शिता और ग्रामीण कनेक्टिविटी को एक साथ मजबूत करने की कोशिश दिखाई देती है.
लखनऊ की सत्ता गलियारों में यह भी चर्चा है कि जमीन और संपत्ति से जुड़े नियमों को सख्त करना आने वाले समय में बड़े राजनीतिक संदेश का हिस्सा भी हो सकता है.
सरकार की तरफ से संकेत साफ है “फाइलों में बदलाव नहीं, सिस्टम के व्यवहार में बदलाव.”
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