
भारतीय रेलवे के लखनऊ मंडल से जो तस्वीर सामने आई है, वह सिर्फ एक कर्मचारी की नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की कार्यशैली पर सवाल है।
लोको पायलट राजेश मीणा जिसके कंधों पर रोज सैकड़ों यात्रियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी होती है—उसे पाइल्स सर्जरी के बाद भी आराम नहीं मिला। डॉक्टर की सलाह, मेडिकल रिपोर्ट, दवाइयों की फाइल… सब दिखाने के बावजूद “ड्यूटी जॉइन करो” का दबाव।
बीमारी पर भी ‘ड्यूटी फर्स्ट’?
सूत्रों के मुताबिक, सर्जरी के बाद घाव पूरी तरह भरा नहीं था। डॉक्टर ने साफ आराम की सलाह दी थी। लेकिन जब छुट्टी बढ़ाने की मांग की गई तो दफ्तर बुलावा आ गया। यहां सवाल सिर्फ एक कर्मचारी का नहीं—क्या बीमार हालत में ट्रेन चलवाना सुरक्षित है?
Railway Running Staff यूनियनों का कहना है कि यह सिर्फ प्रशासनिक सख्ती नहीं, बल्कि लापरवाही है।
वायरल वीडियो और प्रशासन की चुप्पी
लगातार दबाव के बाद, आरोप है कि लोको पायलट ने मजबूरी में अपना घाव अधिकारियों को दिखाया ताकि वे स्थिति समझ सकें। उसी दौरान किसी ने वीडियो बना लिया।
Video वायरल हुआ तो सिस्टम हिल गया। रेलवे प्रशासन का आधिकारिक बयान “प्रक्रिया के अनुसार कार्रवाई हुई, बाद में आराम की अनुमति दे दी गई।”

लेकिन सवाल ये है वीडियो वायरल होने के बाद ही क्यों?
यूनियनों का गुस्सा
लोको पायलट यूनियनों ने इसे अमानवीय बताया है। उनका कहना है कि बीमार कर्मचारी से ड्यूटी लेना खतरनाक है। मेडिकल लीव प्रक्रिया को सरल बनाया जाए। जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई हो। उनका तर्क साफ है “Safety First” का नारा सिर्फ पोस्टर तक सीमित नहीं होना चाहिए।
प्रशासनिक प्रक्रिया या संवेदनहीनता?
रेलवे अधिकारियों का कहना है कि छुट्टी की एक तय प्रक्रिया होती है। लेकिन Ground Reality यह है कि जब एक कर्मचारी को अपनी गरिमा दांव पर लगानी पड़े, तब प्रक्रिया पर पुनर्विचार जरूरी हो जाता है। सिस्टम में नियम जरूरी हैं, लेकिन इंसान उससे ऊपर है।
ट्रेन की सुरक्षा किसके भरोसे?
लोको पायलट थका हो, बीमार हो या मानसिक दबाव में हो उसके हाथ में हजारों यात्रियों की जान होती है। अगर मेडिकल लीव के लिए ऐसी नौबत आ रही है, तो यह सिर्फ एक वायरल वीडियो की कहानी नहीं, बल्कि Safety Protocol की गंभीर चेतावनी है। वीडियो भले कुछ मिनट का हो, लेकिन उसने रेलवे प्रशासन की संवेदनशीलता पर लंबी बहस छेड़ दी है।
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