
ईरान के साथ परमाणु टकराव पहले से चल रहा था, अब चीन का न्यूक्लियर प्रोग्राम अमेरिका की रणनीतिक टेबल पर नया सिरदर्द बनकर उभरा है। अमेरिकी शस्त्र नियंत्रण और अप्रसार ब्यूरो के सहायक विदेश मंत्री क्रिस्टोफर यिआव के बयान के बाद यह मामला वैश्विक बहस का केंद्र बन गया है।
अमेरिका का आरोप है कि चीन ने अपने परमाणु हथियारों के स्टॉक में विस्तार किया है, वह भी बिना पारदर्शिता के। कहा जा रहा है कि बीते छह वर्षों में चीन ने तेज़ी से क्षमता बढ़ाई और एक गुप्त परमाणु परीक्षण भी किया, जिसकी आधिकारिक पुष्टि लंबे समय तक सामने नहीं आई।
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अमेरिका और रूस के बीच आखिरी परमाणु हथियार समझौता समाप्त हो चुका है। इसका मतलब यह कि अब दोनों महाशक्तियों पर पूर्व जैसी कानूनी पाबंदियां नहीं रहीं। ऐसे माहौल में यदि तीसरी बड़ी शक्ति चुपचाप अपने स्टॉक का विस्तार करे, तो रणनीतिक संतुलन हिल सकता है।
इसी वजह से वॉशिंगटन ने मॉस्को, पेरिस और लंदन से बातचीत तेज की है। जिनेवा में हुई मुलाकातों का मकसद चीन पर पारदर्शिता और निरस्त्रीकरण का दबाव बनाना बताया गया है। हालांकि अभी तक कोई ठोस बहुपक्षीय घोषणा सामने नहीं आई।
Iran Factor और बढ़ती वैश्विक खींचतान
न्यूक्लियर मसला पहले से ही अमेरिका-ईरान संबंधों में तनाव का कारण रहा है। मध्य पूर्व में हुई हालिया सैन्य कार्रवाइयों और परमाणु ठिकानों पर हमलों के बाद स्थिति और संवेदनशील हो चुकी है।

अब सवाल यह है कि क्या वैश्विक शक्तियां हथियार नियंत्रण की नई रूपरेखा पर सहमत हो पाएंगी, या फिर दुनिया एक नए परमाणु प्रतिस्पर्धा दौर की ओर बढ़ रही है।
चीन का आधिकारिक रुख हमेशा न्यूनतम प्रतिरोधक क्षमता बनाए रखने का रहा है। लेकिन यदि विस्तार और परीक्षण के दावे सही हैं, तो यह Indo-Pacific से लेकर यूरोप तक की सुरक्षा गणित बदल सकता है। दुनिया की राजनीति इस समय शतरंज की बिसात जैसी दिखती है। हर चाल का जवाब है, लेकिन हर जवाब स्थिरता नहीं लाता।
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