
Alankar Agnihotri, जो बरेली के पूर्व सिटी मजिस्ट्रेट रह चुके हैं, अब प्रशासनिक कुर्सी छोड़कर राजनीतिक अखाड़े में उतरने जा रहे हैं। आज Vrindavan में वे अपनी नई राजनीतिक पार्टी के नाम की औपचारिक घोषणा करेंगे। पार्टी का नाम भगवान राम और भगवान कृष्ण के नामों के संगम से तैयार बताया जा रहा है।
घोषणा से पहले वे Banke Bihari Temple में दर्शन कर आशीर्वाद लेंगे। संदेश स्पष्ट है राजनीति की शुरुआत आध्यात्मिक धरातल से।
संस्कृति, सनातन और सामाजिक संतुलन
मीडिया से बातचीत में अग्निहोत्री ने साफ किया कि उनकी पार्टी का मकसद सिर्फ सत्ता प्राप्ति नहीं है। उनका दावा है कि यह पहल भारतीय संस्कृति, धार्मिक आस्था और सामाजिक सद्भाव को सशक्त करने के लिए है।
प्रशासनिक सेवा से इस्तीफा देने के बाद उन्होंने धार्मिक और शैक्षिक मुद्दों पर खुलकर अपनी राय रखी है। इससे संकेत मिलता है कि उनकी राजनीतिक दिशा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और सामाजिक न्याय के इर्द-गिर्द घूमेगी।
Shankaracharya विवाद पर तीखा रुख
अग्निहोत्री ने Swami Avimukteshwaranand के खिलाफ दर्ज एफआईआर पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि संतों की छवि को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि शिकायतकर्ताओं की पृष्ठभूमि संदिग्ध है और धार्मिक गुरुओं के सम्मान की रक्षा के लिए उनकी पार्टी सड़क से लेकर सदन तक आवाज उठाएगी।
यह बयान बताता है कि उनका राजनीतिक विमर्श सीधे धार्मिक अस्मिता और संस्थागत सम्मान से जुड़ा रहेगा।

इस्तीफे से नई राह तक
अलंकार अग्निहोत्री तब सुर्खियों में आए थे जब उन्होंने यूजीसी गाइडलाइंस और प्रयागराज मेले से जुड़े विवाद के विरोध में पद छोड़ दिया था। एक प्रशासनिक अधिकारी का अचानक इस्तीफा और फिर वैचारिक मोर्चे पर सक्रिय होना, अपने आप में एक राजनीतिक संकेत था।
अब सवाल यह है क्या आध्यात्मिक प्रतीकवाद और प्रशासनिक अनुभव का यह मिश्रण उत्तर प्रदेश की राजनीति में नई जगह बना पाएगा?
वृंदावन को लॉन्च पैड बनाना केवल धार्मिक आस्था का संकेत नहीं, बल्कि एक प्रतीकात्मक रणनीति भी है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में सांस्कृतिक विमर्श पहले से प्रभावी है। ऐसे में नई पार्टी के लिए जगह बनाना आसान नहीं, लेकिन narrative अलग हो तो समीकरण बदल भी सकते हैं।
सियासत में शंखनाद करना सरल है। प्रतिध्वनि कितनी दूर तक जाती है, यह चुनावी मैदान तय करता है।
