
भारत और पाकिस्तान का विभाजन 1947 में आज़ादी से कुछ घंटे पहले ही हो गया था। यही वजह है कि पाकिस्तान 14 अगस्त और भारत 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस मनाता है। दोनों देशों के रिश्ते जन्म लेते ही तनाव में बंध गए थे, लेकिन शुरुआती वर्षों में डिप्लोमेसी की एक खिड़की अभी खुली हुई थी।
क्या दुश्मन देश का नेता Republic Day का मेहमान बन सकता है?
आज के राजनीतिक माहौल में यह सवाल असंभव लगता है। लेकिन इतिहास गवाह है कि भारत ने यह साहसिक कदम उठाया था।
1955 के गणतंत्र दिवस पर दिल्ली के राजपथ (अब कर्तव्य पथ) पर पाकिस्तान के तत्कालीन गवर्नर जनरल मलिक गुलाम मोहम्मद भारत के Chief Guest थे।
(आज के दौर में सोचिए—headline नहीं, भूचाल आ जाता!)
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यह फैसला ऐसे समय लिया गया जब भारत-पाक रिश्ते अभी युद्धों की राख में तब्दील नहीं हुए थे। नेहरू युग की विदेश नीति का फोकस था— Dialogue over dominance, Symbolism over hostility
भारत ने दुनिया को संदेश दिया कि गणतंत्र दिवस सिर्फ शक्ति प्रदर्शन नहीं, शांति का मंच भी हो सकता है।
मलिक गुलाम मोहम्मद: भारत से गहरा रिश्ता
मलिक गुलाम मोहम्मद कोई आम पाकिस्तानी नेता नहीं थे। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से पढ़ाई। पेशे से Chartered Accountant. ब्रिटिश राज में Indian Railway Accounts Service, हैदराबाद के निज़ाम के Financial Advisor यानी उनका प्रशासनिक डीएनए पूरी तरह हिंदुस्तानी सिस्टम में तैयार हुआ था।

पाकिस्तान में सत्ता और साज़िश
1951 में लियाकत अली खान की हत्या के बाद मलिक गुलाम मोहम्मद पाकिस्तान के Governor General बने। उनका कार्यकाल विवादों से भरा रहा 1953 में प्रधानमंत्री ख्वाजा नाजिमुद्दीन की सरकार बर्खास्त। 1954 में Constituent Assembly भंग। सेना और जनरल अयूब खान का खुला समर्थन।
यही वजह थी कि इतने विवादास्पद नेता का भारत आना पूरी दुनिया के लिए चौंकाने वाला था।
दुनिया हैरान, इतिहास गवाह
आज जब भारत-पाक रिश्ते ज़ीरो डिप्लोमेसी मोड में हैं, तब 1955 का यह अध्याय याद दिलाता है कि इतिहास में दुश्मनी स्थायी नहीं होती, लेकिन मौके हाथ से निकल जाएं तो रास्ते बंद हो जाते हैं।
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