दिल्ली की रामलीला में रावण बनकर छाए शाहबाज खान, घोड़े पर एंट्री से ‘सुपरमैन लुक’ तक हर अंदाज की चर्चा

नई दिल्ली: दिल्ली की रामलीलाओं में इस बार अभिनेता शाहबाज खान रावण के किरदार को लेकर खास चर्चा में हैं। फिल्मों और टेलीविजन पर अपने दमदार अभिनय से पहचान बनाने वाले शाहबाज खान कहीं घोड़े पर सवार होकर रावण के रूप में मंच पर उतर रहे हैं, तो कहीं उनके नए पहनावे और जटायु के साथ युद्ध के दृश्य दर्शकों का ध्यान खींच रहे हैं। खास बात यह है कि रावण की भूमिका निभाने के लिए वह सिर्फ अपनी आवाज और संवाद अदायगी पर ही नहीं, बल्कि किरदार के हाव-भाव, वेशभूषा और उसके अलग-अलग पहलुओं पर भी विशेष ध्यान दे रहे हैं।

दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किले के मैदान में आयोजित श्री धार्मिक लीला कमेटी की रामलीला में शाहबाज खान लगातार पांच वर्षों से रावण की भूमिका निभा रहे हैं। इस बार उनके किरदार का रूप पहले से अलग और भव्य बनाया गया है। वहीं, पूर्वी दिल्ली के कड़कड़डूमा स्थित हनुमंत रामलीला में भी उन्होंने रावण की भूमिका निभाई है। यहां 10 से 20 अक्टूबर तक आयोजित रामलीला में पंचवटी प्रसंग, सीता हरण और जटायु वध जैसे महत्वपूर्ण दृश्यों का मंचन किया गया। अलग-अलग आयोजनों में रावण के रूप में उनकी मौजूदगी ने रामलीला देखने पहुंचे दर्शकों के बीच आकर्षण पैदा किया है।

‘सुपरमैन रावण’ का नया लुक, पोशाक में भी दिखा खास प्रयोग

लाल किले की रामलीला में इस बार शाहबाज खान के रावण का पहनावा खास चर्चा में है। अभिनेता के मुताबिक, इस वर्ष उनके पूरे परिधान को नए अंदाज में तैयार किया गया है। रावण की मायावी शक्तियों को ध्यान में रखते हुए पोशाक में सुपरमैन जैसी केप का इस्तेमाल किया गया है। इसी वजह से उन्होंने अपने नए रूप को मजाकिया अंदाज में ‘सुपरमैन रावण’ नाम दिया।

इस बार रावण की पोशाक में काले और लाल रंगों का संयोजन रखा गया है। इसे तैयार करने में मगनलाल ड्रेस के डिजाइनरों की भूमिका है, जो ऐतिहासिक फिल्मों और धारावाहिकों के लिए भी वेशभूषा तैयार कर चुके हैं। शाहबाज खान ने अपने नए रूप को लेकर हल्के-फुल्के अंदाज में कहा कि इस बार रावण ऐसा दिख रहा है, जो मॉडलिंग में भी कैटवॉक कर सकता है।

हालांकि, इस भव्य रूप को मंच पर संभालना आसान नहीं है। रावण का मुकुट और पूरी वेशभूषा काफी भारी होती है। अभिनेता का कहना है कि वजन चाहे 15 किलो हो या 20 किलो, कलाकार को अपने किरदार के लिए उसे उठाना ही पड़ता है। उनके लिए सबसे अहम यह है कि मंच पर किरदार प्रभावशाली दिखाई दे और दर्शकों तक उसकी भव्यता पहुंच सके।

जटायु के साथ युद्ध और घोड़े पर एंट्री ने खींचा ध्यान

रामलीला में रावण की भूमिका केवल ऊंची आवाज में संवाद बोलने तक सीमित नहीं रहती। सीता हरण और जटायु के साथ युद्ध जैसे प्रसंगों में कलाकार को शक्ति, क्रोध, अहंकार और संघर्ष के भाव भी मंच पर उतारने होते हैं। शाहबाज खान के अभिनय में इन दृश्यों को लेकर दर्शकों की विशेष दिलचस्पी देखने को मिल रही है।

लाल किले की रामलीला में घोड़े पर सवार होकर उनकी एंट्री भी आकर्षण का केंद्र बनी। रावण और जटायु के बीच युद्ध के दृश्य ने दर्शकों का ध्यान खींचा। इस प्रस्तुति की चर्चा सामाजिक माध्यमों पर भी हुई। घोड़े पर उनकी एंट्री ने टेलीविजन धारावाहिक ‘चंद्रकांता’ के दर्शकों को भी उनके पुराने किरदारों की याद दिलाई।

रामायण में जटायु वह पक्षीराज हैं, जो सीता का अपहरण करके ले जा रहे रावण को रोकने का प्रयास करते हैं। इस संघर्ष में वह गंभीर रूप से घायल हो जाते हैं। बाद में जटायु ही भगवान राम को सीता के अपहरण की जानकारी देते हैं। इस प्रसंग को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने के लिए कलाकारों को युद्ध के दृश्य के साथ उसके भावनात्मक पक्ष को भी समझना पड़ता है।

‘चंद्रकांता’ से मिली पहचान, ऐतिहासिक किरदारों में भी रहे चर्चित

शाहबाज खान हिंदी फिल्मों और टेलीविजन की दुनिया का जाना-पहचाना नाम हैं। मध्य प्रदेश में जन्मे शाहबाज के पिता संगीत से जुड़े रहे हैं। अभिनय के क्षेत्र में उन्होंने ऐतिहासिक, काल्पनिक और नकारात्मक भूमिकाओं के जरिए अपनी अलग पहचान बनाई।

नब्बे के दशक में दूरदर्शन पर प्रसारित लोकप्रिय धारावाहिक ‘चंद्रकांता’ में कुंवर वीरेंद्र विक्रम सिंह की भूमिका ने उन्हें बड़ी पहचान दिलाई। देवकीनंदन खत्री के उपन्यास पर आधारित इस धारावाहिक में शिखा स्वरूप ने राजकुमारी चंद्रकांता का किरदार निभाया था। शाहबाज खान के साथ इस धारावाहिक में कई अन्य चर्चित कलाकार भी नजर आए थे।

इसके अलावा उन्होंने ‘द स्वॉर्ड ऑफ टीपू सुल्तान’ में हैदर अली की भूमिका निभाई। ‘द ग्रेट मराठा’ और ‘बेताल पच्चीसी’ जैसे धारावाहिकों में भी उनके अभिनय को देखा गया। ऐतिहासिक और काल्पनिक किरदारों को निभाने के दौरान उनकी आवाज, संवाद बोलने के अंदाज और प्रभावशाली व्यक्तित्व ने उन्हें अलग पहचान दिलाई।

टेलीविजन के साथ शाहबाज खान ने हिंदी फिल्मों में भी काम किया है। उनकी फिल्मोग्राफी में ‘मेजर साब’, ‘राजू चाचा’, ‘द हीरो: लव स्टोरी ऑफ अ स्पाई’ और ‘एजेंट विनोद’ जैसी फिल्में शामिल हैं। उनके अभिनय सफर में अलग-अलग तरह की भूमिकाएं रही हैं, हालांकि ऐतिहासिक पात्रों और दमदार विरोधी किरदारों के लिए उन्हें खास तौर पर याद किया जाता है।

रावण के किरदार में क्यों है शाहबाज खान की दिलचस्पी?

शाहबाज खान के लिए रावण केवल रामायण का विरोधी पात्र नहीं, बल्कि कई भावनात्मक और व्यक्तित्व संबंधी पहलुओं वाला किरदार है। रावण को कथा में एक शक्तिशाली राजा, विद्वान और भगवान शिव का बड़ा भक्त बताया गया है। इसके बावजूद उसका अहंकार और उसके फैसले उसे विनाश की ओर ले जाते हैं। अभिनेता के सामने चुनौती यही रहती है कि वह उसके प्रभावशाली व्यक्तित्व के साथ उसके पतन की वजहों को भी अभिनय के जरिए सामने लाएं।

शाहबाज खान का मानना है कि रामलीला केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है। इसके जरिए लोग अपनी सांस्कृतिक परंपराओं, जीवन मूल्यों और भगवान श्रीराम के आदर्शों को समझ सकते हैं। उन्होंने माता-पिता से अपील की कि वे अपने बच्चों को रामलीला दिखाने लेकर आएं, ताकि नई पीढ़ी अपनी परंपराओं से जुड़ सके और बड़ों का सम्मान करने जैसे संस्कारों को समझे।

उनके मुताबिक, रामलीला में निभाए जाने वाले किरदारों से भी जीवन के कई सबक मिलते हैं। रावण का चरित्र बताता है कि ज्ञान, शक्ति और सामर्थ्य होने के बावजूद अहंकार व्यक्ति के पतन का कारण बन सकता है। यही वजह है कि इस किरदार को निभाते समय उसके बाहरी वैभव के साथ उसके आंतरिक स्वभाव को समझना भी जरूरी है।

रामलीला के दस दिन बदल जाती है दिनचर्या

मंच पर क्रोध और अहंकार के प्रतीक रावण का अभिनय करने वाले शाहबाज खान वास्तविक जीवन में रामलीला के दिनों में अनुशासित दिनचर्या अपनाते हैं। उन्होंने बताया कि दशहरा पर्व के दस दिनों के दौरान वह पूरी तरह शाकाहारी भोजन करते हैं और मदिरापान तथा सिगरेट से दूर रहते हैं। उनके मुताबिक, यह समय शरीर को आराम देने और अपनी दिनचर्या को बेहतर बनाने का अवसर भी होता है।

शाहबाज खान का कहना है कि रामलीला के मंच पर अभिनय का अनुभव फिल्मों से काफी अलग होता है। कैमरे के सामने कलाकार को अपने भाव और संवाद के जरिए दृश्य को प्रभावी बनाना होता है, जबकि खुले मंच पर उसे अपनी आवाज और हाव-भाव से दूर बैठे दर्शकों तक भी अपनी प्रस्तुति पहुंचानी पड़ती है।

लाइव दर्शकों के सामने अभिनय करने की सबसे खास बात यह है कि संवाद बोलते ही तालियों और प्रतिक्रियाओं के रूप में तुरंत प्रतिक्रिया मिलती है। अभिनेता के मुताबिक, मंच से मिलने वाली इस ऊर्जा का अलग ही अनुभव होता है। यही अनुभव उन्हें लगातार रामलीला से जोड़े हुए है।

103 साल पुरानी परंपरा से जुड़ाव, सुरक्षा के भी इंतजाम

श्री धार्मिक लीला कमेटी की ओर से आयोजित लाल किले की रामलीला को दिल्ली की पुरानी सांस्कृतिक परंपराओं में गिना जाता है। शाहबाज खान ने बताया कि कमेटी पिछले 103 वर्षों से रामलीला का आयोजन कर रही है। उन्होंने आयोजन से जुड़े पदाधिकारियों और पूरी टीम की सराहना करते हुए कहा कि इस तरह के बड़े कार्यक्रम को श्रद्धा और समर्पण के साथ आयोजित करना महत्वपूर्ण है।

वहीं, कड़कड़डूमा की हनुमंत रामलीला कमेटी के लीला मंत्री विनीत जैन के मुताबिक, कमेटी कई वर्षों से इस क्षेत्र में रामलीला आयोजित कर रही है। दर्शकों की सुरक्षा के लिए दिल्ली पुलिस के सहयोग से व्यवस्था की गई है। परिसर में स्वयंसेवकों की तैनाती के साथ सीसीटीवी कैमरों से निगरानी रखी जा रही है। दर्शकों के लिए खाने-पीने की सुविधाएं भी उपलब्ध कराई गई हैं।

दिल्ली की इन रामलीलाओं में इस बार शाहबाज खान का रावण कई वजहों से चर्चा में है। कहीं उनका नया ‘सुपरमैन’ अंदाज आकर्षण पैदा कर रहा है, तो कहीं घोड़े पर उनकी एंट्री और जटायु के साथ युद्ध का दृश्य दर्शकों को प्रभावित कर रहा है। फिल्मों और टेलीविजन में लंबा सफर तय कर चुके शाहबाज खान के लिए यह मंच अभिनय की एक अलग दुनिया है, जहां पहले से परिचित कहानी को हर बार नए अंदाज में दर्शकों के सामने जीवंत करने की चुनौती होती है।

Related posts