हर साल जयंती आती है, फूल चढ़ते हैं, भाषण होते हैं… लेकिन असली सवाल वहीं रह जाता है—क्या हम सच में डॉ. भीमराव आंबेडकर को समझ पाए हैं? या फिर उन्हें सिर्फ तस्वीरों तक सीमित कर दिया है? आज के भारत में, जहां समानता और अधिकार की बहस अब भी जिंदा है, बाबा साहब के विचार पहले से कहीं ज्यादा प्रासंगिक नजर आते हैं। संघर्ष से संविधान तक—एक असाधारण यात्रा डॉ. आंबेडकर का जीवन केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि एक आंदोलन की शुरुआत था। समाज के सबसे निचले…
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सवर्ण + सोशल जस्टिस: विरोधाभास नहीं, वैचारिक विरासत
भारत में जाति को लेकर बहस अक्सर शोर में बदल जाती है, जहां पहचान को विचारधारा के खिलाफ खड़ा कर दिया जाता है। इसी माहौल में जब मैं कहता हूँ कि “मैं सवर्ण हूँ, लेकिन सोशल जस्टिस का कट्टर समर्थक हूँ”, तो उसे या तो अपवाद माना जाता है या संदेह की नजर से देखा जाता है। जबकि हकीकत इससे कहीं ज्यादा सीधी और संवैधानिक है। पहचान बनाम विचारधारा सवर्ण होना कोई वैचारिक प्रमाणपत्र नहीं है, मैं जन्मा ब्राहमण लेकिन पंडित नहीं हूँ क्योंकि मैं वेदपाठी नहीं हूँ। ठीक वैसे…
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