लखनऊ के बंथरा के नींवा गांव की सुबह किसी आम दिन जैसी नहीं थी। यहां चाय की केतली नहीं उबली, बल्कि एक घर के भीतर मौत ने खामोशी से दस्तक दी। मां और बेटे की लाशें, मुंह से निकलता झाग, और बिखरी हुई उम्मीदें… ये सिर्फ एक खबर नहीं, सिस्टम की असफलता का पोस्टमार्टम है। एक छोटा सा परिवार, एक छोटा सा ढाबा, और बड़ा सा कर्ज। सवाल सीधा है क्या बैंक की EMI अब मौत का वारंट बन चुकी है? बंथरा का वो कमरा जहां जिंदगी हार गई 52…
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