
देश की सर्वोच्च अदालत ने हाल ही में ज्योति शर्मा बनाम विष्णु गोयल (कर्नाटक) केस में ऐसा फैसला सुनाया है, जो देशभर के किरायेदारों और मकानमालिकों के लिए नज़ीर बन गया है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा — “किरायेदार मालिक की अनुमति से रहता है, इसलिए Adverse Possession (प्रतिकूल कब्जे) का सिद्धांत लागू नहीं होता।”
यानि, अगर आप किसी मकान में सालों से किराए पर रह रहे हैं, तब भी उस संपत्ति के मालिक नहीं बन सकते!
क्या था मामला?
कर्नाटक में किरायेदार ज्योति शर्मा ने दावा किया कि वह कई दशकों से उसी संपत्ति में रह रही हैं, इसलिए Adverse Possession के तहत अब वह मालिकाना हक़ रखती हैं।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने यह दलील खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा — “मालिक की अनुमति से रहने वाला व्यक्ति प्रतिकूल कब्जे का दावा नहीं कर सकता। जब तक किरायेदार किराया दे रहा है, वह मालिक की इच्छा से ही रह रहा है।”
“किराया भरने से स्वामित्व नहीं मिलता”
कोर्ट ने यह भी कहा कि किराया भरने या लंबे समय तक कब्जा बनाए रखने से किसी को स्वामित्व का अधिकार नहीं मिल जाता।
“संपत्ति का मालिक हमेशा मालिक ही रहेगा — उसे अपनी संपत्ति किसी भी वक्त वापस पाने का पूरा अधिकार है।”
इस फैसले का असर क्या होगा?
लंबी अवधि से किराए पर रहने वाले लोगों के लिए यह कानूनी स्पष्टता लेकर आया है। मकानमालिकों को अपनी संपत्ति पर स्वामित्व की सुरक्षा मिलेगी। Adverse Possession के झूठे दावों पर अब अदालतें और सख्ती बरतेंगी।
अब किरायेदार कहेंगे — “हम तो सिर्फ रेंट पे करते हैं, ओनरशिप के सपने नहीं!” और मकान मालिक मुस्कुराते हुए बोलेंगे — “घर मेरा है, किरायेदार प्यारा है… पर अधिकार अब भी हमारा है!”
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