Period Leave पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: “कानून बना तो नौकरी कौन देगा?”

राघवेन्द्र मिश्रा
राघवेन्द्र मिश्रा

दिल्ली की सुबह में अदालत की कार्यवाही शुरू हुई तो किसी को अंदाजा नहीं था कि मासिक धर्म अवकाश (Period Leave) पर बहस अचानक इतना तीखा मोड़ ले लेगी।

याचिका में मांग की गई थी कि महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान पेड पीरियड लीव अनिवार्य किया जाए। सुनने में यह मांग महिला अधिकारों के पक्ष में लगती है, लेकिन अदालत की नजर में तस्वीर इतनी सरल नहीं थी।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने साफ शब्दों में कहा कि महिलाओं को “कमजोर” बताने वाली नीतियां कभी-कभी उल्टा नुकसान भी कर सकती हैं।

CJI की दो टूक: “कानून बना तो नौकरी देने से डरेंगे”

मुख्य न्यायाधीश Surya Kant ने सुनवाई के दौरान एक ऐसी टिप्पणी की जिसने पूरे मामले की दिशा बदल दी। उन्होंने कहा कि यदि पीरियड लीव को कानून बनाकर अनिवार्य कर दिया गया, तो कई संस्थान महिलाओं को नौकरी देने से हिचक सकते हैं।

अदालत का तर्क साफ था। कॉरपोरेट और संस्थानों की मानसिकता में यह धारणा बन सकती है कि महिला कर्मचारियों के साथ “अतिरिक्त बाध्यता” जुड़ी है। और यही सोच महिलाओं के कैरियर ग्रोथ और अवसरों पर असर डाल सकती है।

अदालत की नजर में ‘सहानुभूति’ बनाम ‘समानता’

बेंच ने यह भी कहा कि समाज को महिलाओं के प्रति सहानुभूति दिखाने के बजाय समान अवसर देने की मानसिकता विकसित करनी चाहिए।

अदालत के शब्दों में, “ऐसी याचिकाएं अनजाने में महिलाओं को कमजोर दिखाती हैं और मासिक धर्म को एक ‘दुर्भाग्यपूर्ण घटना’ जैसा प्रस्तुत करती हैं।”

यह टिप्पणी केवल कानूनी तर्क नहीं थी, बल्कि एक सामाजिक संदेश भी था कि वर्कप्लेस इक्वालिटी का रास्ता संवेदनशील नीतियों से गुजरता है, लेकिन लेबलिंग से नहीं।

याचिकाकर्ता की दलील: कई जगह पहले से मिल रही है छुट्टी

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता M. R. Shamshad ने अदालत को बताया कि कुछ संस्थान और राज्य सरकारें पहले से ऐसी व्यवस्था लागू कर चुके हैं। उदाहरण के तौर पर Kerala में स्कूलों में छात्राओं के लिए विशेष छुट्टी की व्यवस्था की गई है।

इसके अलावा कई निजी कंपनियां भी स्वेच्छा से पीरियड लीव दे रही हैं। लेकिन अदालत का जवाब सीधा था अगर कोई संस्था स्वेच्छा से ऐसा करती है तो स्वागत है, मगर इसे कानूनी बाध्यता बनाना अलग बात है।

अदालत का संकेत: फैसला सरकार के पाले में

सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए यह भी कहा कि इस मुद्दे पर अंतिम निर्णय सरकार और नीति-निर्माताओं के स्तर पर होना चाहिए।

केंद्र सरकार विभिन्न राज्यों, कंपनियों और विशेषज्ञों से चर्चा करके एक संतुलित नीति बना सकती है। अदालत का यह रुख एक तरह से संकेत है कि यह मामला सिर्फ कानून का नहीं बल्कि समाज, रोजगार और लैंगिक समानता के जटिल समीकरण से जुड़ा हुआ है।

बहस अभी खत्म नहीं हुई

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है। एक पक्ष कह रहा है कि पीरियड लीव महिला कर्मचारियों के स्वास्थ्य और सम्मान के लिए जरूरी है। दूसरा पक्ष मानता है कि इससे कार्यस्थल पर महिलाओं के प्रति पूर्वाग्रह बढ़ सकता है।

सच शायद इन दोनों के बीच कहीं खड़ा है। अभी अदालत ने दरवाजा बंद किया है, लेकिन नीति की खिड़की खुली छोड़ दी है। और यही वजह है कि आने वाले दिनों में पीरियड लीव पर बहस अदालत से निकलकर संसद, कॉरपोरेट बोर्डरूम और समाज के ड्राइंग रूम तक पहुंच सकती है।

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