दिल्ली में Handshake! Middle East के ‘Enemy-Friends’ का खेल क्या है?

हुसैन अफसर
हुसैन अफसर

पहले बम गिरते हैं… फिर हाथ मिलते हैं। जहां खून बहा है, वहीं अब कूटनीति की चाय पर चर्चा होगी। और सवाल ये है कि ये दुश्मनी असली है… या सिर्फ दुनिया को दिखाने वाला एक ड्रामा?

Middle East इस वक्त बारूद के ढेर पर बैठा है, लेकिन अगले महीने वही देश भारत में एक ही टेबल पर बैठेंगे। ये खबर नहीं, ये ग्लोबल पॉलिटिक्स का सबसे बड़ा प्लॉट ट्विस्ट है। जंग सिर्फ जमीन पर नहीं लड़ी जाती… असली जंग टेबल पर जीती जाती है।

जंग का मैदान: दोस्ती का भ्रम टूटा?

ईरान ने जब अमेरिकी ठिकानों पर हमला किया, तो उसकी आग सऊदी अरब और UAE तक पहुंच गई। तेल, गैस और पावर के सेंटर पर हमले ने दोनों देशों को हिला दिया। UAE ने खुलकर अमेरिका का साथ देने का ऐलान कर दिया। सऊदी अरब पहले से ही ईरान के खिलाफ खड़ा है।

यह सिर्फ सैन्य टकराव नहीं था, यह Middle East के power balance का seismic shift था। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती…जहां गोलियां चलती हैं, वहीं अगले दिन कूटनीति की मुस्कान भी खिलती है।

दिल्ली में दोस्ती: BRICS का मंच

14-15 मई को नई दिल्ली में BRICS Summit होने जा रहा है। और यहां वही तीन देश, जो आज दुश्मन हैं, एक साथ बैठेंगे। ईरान, UAE और सऊदी अरब — तीनों BRICS के सदस्य हैं। मतलब?
जंग अपनी जगह… लेकिन global मंच पर ये “partners” हैं। भारत इस पूरे इवेंट का host है, और ये सिर्फ एक मीटिंग नहीं, बल्कि geopolitical chessboard का grand move है। दुश्मन वही होता है जो टेबल पर नहीं बैठता… यहां तो सब साथ चाय पीने आ रहे हैं।

सिस्टम का खेल: दुश्मनी या रणनीति?

Middle East की राजनीति सीधी नहीं, layered है। यहां दुश्मनी permanent नहीं होती… सिर्फ interests permanent होते हैं। आज UAE अमेरिका के साथ है कल वही UAE ईरान के साथ व्यापार करेगा। सऊदी अरब भी तेल के खेल में हर किसी के साथ adjust करता है। ये “enemy-friends” मॉडल है — जहां public में टकराव, private में समझौता चलता है।

यहां रिश्ते दिल से नहीं… डॉलर और तेल से बनते हैं।

असली कारण: तेल, ताकत और टाइमिंग

पूरी कहानी का असली villain या hero… तेल है। Hormuz Strait पर control का मतलब है global economy की नब्ज पकड़ लेना।

ईरान चाहता है दबदबा UAE चाहता है dominance,सऊदी चाहता है stability और अमेरिका चाहता है… control इसलिए जंग भी हो रही है और बातचीत भी।

Middle East में ideology नहीं… सिर्फ economy चलती है।

भारत की भूमिका: मेजबान या मास्टरमाइंड?

भारत इस पूरे खेल में silent spectator नहीं है। BRICS Summit host करना सिर्फ एक diplomatic event नहीं, बल्कि global positioning है। भारत एक ऐसा मंच बन रहा है जहां दुश्मन भी neutral ground पर आकर बात करें।

लेकिन असली सवाल ये है क्या भारत सिर्फ host है… या इस game का hidden referee? दिल्ली अब सिर्फ राजधानी नहीं… global diplomacy का arena बन रही है।

अगर ये देश जंग भी लड़ सकते हैं और साथ बैठ भी सकते हैं…तो असली दुश्मनी कहां है? क्या ये सब सिर्फ जनता को दिखाने के लिए है? क्या युद्ध सिर्फ pressure tactics है? या फिर दुनिया एक scripted geopolitics देख रही है? जब दुश्मन दोस्त बन जाए… तो समझ लो खेल कहीं और चल रहा है।

आम इंसान: सबसे बड़ा हारने वाला

इस पूरे खेल में सबसे ज्यादा नुकसान किसका? आम जनता का। तेल महंगा, महंगाई बढ़ी, instability बढ़ी। जो लोग जंग नहीं चाहते, वही इसकी कीमत चुका रहे हैं। और जो फैसले लेते हैं… वो एयर-कंडीशंड कमरों में बैठकर strategy बना रहे हैं। जंग हमेशा बॉर्डर पर नहीं होती… उसका असर रसोई तक पहुंचता है।

Middle East की यह कहानी हमें एक सच्चाई दिखाती है— दुनिया में कोई permanent दोस्त या दुश्मन नहीं होता। आज जो दुश्मन है, वो कल partner बन सकता है। और जो दोस्त है, वो अगले हफ्ते target बन सकता है।

BRICS Summit में जब ये नेता एक साथ बैठेंगे, तो कैमरे सिर्फ handshake दिखाएंगे…लेकिन असली कहानी उस handshake के पीछे छिपी होगी। दुनिया जंग से नहीं चलती… दुनिया “डील” से चलती है।

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